शेख भिखारी के पास गोलियां खत्म होने लगी तो शेख भिखारी ने अपनी फौज को पत्थर लुढ़काने का हुक्म दिया. इससे अंगरेज फौजी कुचलकर मरने लगे. यह देखकर जनरल मैकडोन ने मुकामी लोगों को मिलाकर चुट्टूघाटी पहाड़ पर चढ़ने के लिए दूसरे रास्ते की जानकारी ली. फिर उस खुफिया रास्ते से चुट्टूघाटी पहाड़ पर चढ़ गये. 

बाद में बड़कागढ़ जगन्नाथपुर के राजा ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने उनको अपने यहां दीवान के पद पर रख लिया़  शेख भिखारी के जिम्मे में बड़कागढ़ की फौज का भार दे दिया गया. उस फौज में मोमिन और आदिवासी नौजवान थे. 
 
1856 ई में जब अंगरेजों ने राजा महाराजाओं पर चढ़ाई करने का मनसूबा बनाया तो इसका अंदाजा हिंदुस्तान के राजा-महाराजाओं को होने लगा था. जब इसकी भनक ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को मिली तो उन्होंने अपने वजीर पांडे गनपतराय दीवान शेख भिखारी, टिकैत उमरांव सिंह से मशवरा किया

विरोध में रामगढ़ के हिंदुस्तानी रेजिमेंट ने अपने अंगरेज अफसर को मार डाला. नादिर अली हवलदार और रामविजय सिपाही ने रामगढ़ रेजिमेंट छोड़ दिया और जगन्नाथपुर में शेख भिखारी की फौज में मिल गये. इस तरह जंगे आजादी की आग छोटानागपुर में फैल गयी. रांची, चाईबासा, संथाल परगना के जिलों से अंगरेज भाग खड़े हुए

1857  की जंग ए आजादी में लड़नेवाले शेख भिखारी का जन्म 1831 ई में रांची जिला के होक्टे गांव में एक बुनकर मोमिन खानदान में हुआ था़  बचपन से वह अपने खानदानी पेशा, मोटे कपड़े तैयार करना और हाट बाजार में बेचकर अपने परिवार की परवरिश करते थे़


जब उनकी उम्र 20 वर्ष की हुई तो उन्होंने छोटानागपुर के महाराज के यहां नौकरी कर ली. परंतु कुछ ही दिनों के बाद उन्होंने राजा के दरबार में एक अच्छी मुकाम प्राप्त कर ली

देश के लिए हंसते हंसते सूली पर चढ़ जाने वाले ‘शेख भिखारी’ को इतिहास ने भुला दिया

इन सभी ने अंगरेजों के खिलाफ मोरचा लेने की ठान ली और जगदीशपुर के बाबू कुंवर सिंह से पत्राचार किया. इसी बीच में शेख भिखारी ने बड़कागढ़ की फौज में रांची एवं चाईबासा के नौजवानों को भरती करना शुरू कर दिया. अचानक अंगरेजों ने 1857 में चढ़ाई कर दी. 

इसकी खबर शेख भिखारी को नहीं हो सकी. अंगरेजों ने शेख भिखारी एवं टिकैत उमराव सिंह को छह जनवरी 1858 को घेर कर गिरफ्तार कर लिया और सात जनवरी 1858 को उसी जगह चुट्टूघाटी पर फौजी अदालत लगाकर मैकडोना ने शेख भिखारी और उनके साथी टिकैत उमरांव को फांसी का फैसला सुनाया. 
 
आठ जनवरी 1858 को आजादी के आलमे बदर शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह को चुट्टूपहाड़ी के बरगद के पेड़ से लटका कर फांसी दे दी गयी. वह पेड़ आज भी सलामत है. यह पेड़ आज भी हमें उनकी याद दिलाता है़