भूमि एवं तयारी 


पालक उगाने के लिए समतल भूमि का चुनाव करना चाहिए जिस जगह का चुनाव करें वहां पानी के निकास कि अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए  जीवांश युक्त बलुई या दोमट या मटियार किस्म कि होती है तो उसमे पौधे कि बढ़वार अच्छी होती  है


ध्यान रहे कि पालक के पौधे अम्लीय जमीन में नहीं बढ़ते जबकि क्षारीय जमीन में इसकी खेती आसानी पूर्वक कि जा सकती है भूमि का पी.एच. मान 6 से 7 के मध्य हो। भूमि की तैयारी के लिए भूमि का पलेवा करके जब वह जुताई योग्य हो जाए तब मिट्टी पलटने वाले हल से एक जुताई करना चाहिए,


इसके बाद 2 या 3 बार हैरो या कल्टीवेटर चलाकर मिट्टी को भूरभूरा बना लेना चाहिए। साथ ही पाटा चलाकर भूमि को समतल करें।खरपतवारों के डंठल और अन्य अवांछित वस्तुओं को निकाल देते है ।

​​पाबुवाई का ढंग एवं बीज की मात्रा 

पालक की बुवाई दो तरीकों से की जाती है । पहली विधि में बीज को खेत में छिटककर बोते हैं तथा दूसरा विधि में बीज को समान दूरी पर कतारों में बोते हैं । कतारों की विधि सबसे अच्छी रहती है । इस विधि में निराई-गुड़ाई तथा कटाई आसानी से हो जाती है ।

पालक के खेत के लिये बीज की 40 किलो प्रति हेक्टर की आवश्यकता होती है । अच्छे अंकुरण के लिये खेत में नमी का होना अति आवश्यक है । बुवाई के बाद बीज को भूमि की ऊपरी सतह में मिला देना चाहिए ।

बगीचे के लिए बीज की मात्रा 100-125 ग्राम 8-10 वर्ग मी. क्षेत्र के लिये पर्याप्त होती है । पालक को गमलों में भी लगाया जा सकता है । एक गमले में 4-5 बीज बोने चाहिए । गमलों से भी समय-समय पर अच्छी पैदावार मिलती है । बोने के बाद बीज को हाथ से मिट्‌टी में मिला देना चाहिए तथा पानी की मात्रा अंकुरण के लिए देनी चाहिए ।

​​सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई 

पालक की फसल के लिये पहली सिंचाई अंकुरण के 6-7 दिन के बाद करनी चाहिए । बीज की बुवाई भूमि में पर्याप्त नमी होने पर करनी चाहिए । इस प्रकार से जाड़ों में 12-15 दिन के अन्तराल से सिंचाई करते रहना चाहिए तथा जायद या देर से बोने वाली फसल के लिये सिंचाई की अधिक आवश्यकता पड़ती है । इस मौसम की फसल को 4-5 दिन के बाद पानी देते रहना चाहिए । इस प्रकार से पालक की फसल के लिये सिंचाई व नमी को लगातार बनाये रखना अति आवश्यक है ।

बगीचे की फसल के लिये भी सिंचाई नमी के लिए आवश्यकतानुसार करते रहना चाहिए । जाड़ों की फसल के लिए 8-10 दिन के बाद तथा जायद की फसल की सिंचाई हल्की-हल्की 2-3 दिन में करते रहना अति आवश्यक है । अच्छी उपज के लिये सिंचाई का बहुत ही योगदान होता है । गमलों में नमी के अनुसार 2-3 दिन के बाद तथा जायद की फसल के लिए रोज शाम को ध्यान से पानी देते रहना चाहिए । पानी देते समय ध्यान रहे कि गमलों में लगे पौधे टूटे नहीं और फव्वारे से ऊपर की दूरी से नहीं देना चाहिए ।

पालक की उन्नत खेती कैसे करें और अधिक मुनाफ़ा कमायें 

​​उपज

पालक की उपज प्रत्येक जाति के ऊपर निर्भर करती है । पूसा आल ग्रीन 30 हजार किलो तथा पूसा ज्योति की उपज 40 हजार किलो प्रति हेक्टर उपज प्राप्त होती है । औसतन प्रत्येक जाति की उपज 25-35 हजार किलो प्रति हेक्टर पैदावार उपलब्ध हो जाती है । बगीचे में भी 20-25 किलो पत्तियां प्राप्त हो जाती हैं जो कि समय-समय पर मिलती रहती हैं ।

​​खर पतवार नियंत्रण 


यदि क्यारी में कुछ खर पतवार उग आये हो तो उन्हें जड़ से उखाड़ देना चाहिए यदि पौधे कम उगे हो तो उस अवस्था में खुरपी- कुदाल के जरिये गुड़ाई करने से पौधे कि बढ़वार अच्छी हो जाती है ।
कीट नियंत्रण 
साधारणतया पालक के पौधे पर कीट का प्रभाव नहीं पड़ता है । परन्तु फसल पत्ती खाने वाले कैटर पिलर का प्रकोप देखा जाता है यह शुरू में पत्तियों को खाता फिर तने को पूर्णतया नष्ट कर देता है इसके लिए नीम का काढ़ा का घोल बनाकर हर १५ - २० दिन में छिड़काव करते रहना चाहिए या २० ली गौ मूत्र में 3 किलो नीम की पत्ती आधा किलो तम्बाकू का घोल बना कर छिड्काब करें  

​​पालक की उन्नतशील जातियां 

पालक की कुछ मुख्य जातियां हैं जिनको भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा बोने की सिफारिश की जाती है, वे निम्नलिखित हैं-

1. पालक ऑल ग्रीन (Palak All Green)– इस किस्म से एक साथ हरी पत्तियां प्राप्त होती हैं । पत्तियां 40 दिन में तैयार हो जाती है । पत्तियां छोटी-बड़ी न होकर एक-सी होती हैं । वृद्धि काल-अन्तिम सितम्बर से जनवरी आरम्भ का समय होता है । इसे 5-6 बार काटा जा सकता है ।

2. पालक पूसा ज्योति (Palak Pusa Jyoti)- यह जाति अधिक पैदावार देती है । पत्तियां समान, मुलायम होती हैं तथा गहरी हरे रंग की होती हैं । पहली कटाई 40-45 दिनों में आरम्भ हो जाती है । सितम्बर से फरवरी के अन्त तक पत्तियों की वृद्धि अधिक होती है । 8-10 बार फसल की कटाई की जाती है । यह फसल 45 हजार किलोग्राम-हेक्टर पैदावार देती है ।

3. पालक पूसा हरित (Palak Pusa Harit)- इस किस्म के पौधे ऊंचे, एक समान तथा वृद्धि वाले होते हैं । अधिक पैदा देने वाली किस्म है जो सितम्बर से मार्च तक अच्छी वृद्धि करती है ।

पत्तियों वाली सब्जियों में पालक भी एक भारतीय सब्जी है जिसकी खेती अधिक क्षेत्र में की जाती है । यह हरी सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है । इसकी पत्तियां स्वास्थ्य के लिये बहुत ही लाभकारी हैं । इसकी खेती सम्पूर्ण भारतवर्ष में की जाती है । यह सब्जी विलायती पालक की तरह पैदा की जाती है ।


इसकी पत्तियों का प्रयोग सब्जी के अतिरिक्त नमकीन पकौड़े, आलू मिलाकर तथा भूजी बनाकर किया जाता है । पालक के सेवन से पोषक तत्वों की प्राप्ति होती है । अधिक मात्रा में प्रोटीन, कैलोरीज, खनिज, कैल्शियम तथा विटामिन्स ए, सी का एक मुख्य साधन है जो कि दैनिक जीवन के लिए अति आवश्यक है ।