इस फतवे का व्यापक असर हुआ और अवाम के भीतर अंग्रेज़ों विरोधी भावना और भी ज़्यादा भड़क गई।
फ़तवा देने के कुछ साल बाद शाह अब्दुल अज़ीज़ देहलवी ने अपने शागिर्द सय्यद अहमद रायबरेलवी को मराठा यशवंत राव होलकर के मुंह बोले भाई राजपुताना के आमिर खान की सेना में भेज दिया क्यूंकि उस समय मराठा यशवंत राव होलकर और आमिर खान दोनों संयुक्त रूप से अंग्रेज़ों से लोहा लेने का इरादा रखते थे।

दूसरी तरफ वेटिकन पोप की तरफ से ईसाई राहिब भेजे जा रहे थे जो यहां कच्चे पक्के आलिमो से मुनाज़रे करके उन्हें हराते जा रहे थे क्योंकि पाये के उलेमा या तो शहीद हो चुके थे या मंज़रेआम पर आने से बच रहे थे वैसे भी उस वक़्त ईंजील के जानकार उलेमा कम ही थे,


एक पाथ फाइंडर नाम का ईसाई राहिब कलकत्ता पोर्ट से होता हुआ, रास्ते में मुनाज़रे जीतता हुआ दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर आकर बैठ गया और ऐलान कर दिया कि हिन्दुस्तान में जो कोई मुझे मुनाज़रे में हरा सके सामने आए।

अंग्रेज इतिहासकार लिखते हैं कि इसके बाद अंग्रेजों ने दिल्ली में क़तल ए आम शुरू कर दिया। और 30 हज़ारों उलेमाओं को शहीद कर दिया गया कुछ को फांसी के तख़्ते पर चढ़ा दिया गया। हज़ारो उलेमाओं को तोप से उड़ा कर शहीद कर दिया गया।


और बहुतों को काले पानी की सज़ा दे दी गई। सर सैयद अहमद खां का खानदान शहीद हो गया उनकी माँ को जान बचाने के लिए हफ़्तों अस्तबल में छिपे रहना पड़ा।

जिसकी शुरुआत शाह वलीउल्लाह देहलवी के अंग्रेज़ विरोधी विचारों से होती है लेकिन इस आन्दोलन की औपचारिक शुरुआत उस समय होती है जब शाह वलीउल्लाह देहलवी रह० के बेटे शाह अब्दुल अज़ीज़ देहलवी ने सन 1803 में अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद का फ़तवा जारी कर जेहाद फ़र्ज़ कर दिया।

इन तशवीशनाक हालात में अल्लाह तआला ने दो अज़ीम शख्सियत से अपने दीन की खिदमात ली, मौलाना क़ासिम नानौतवी और उनके साथियों ने 1866 मे देवबंद में अनार के दरख्त के नीचे एक मदरसे की शुरुआत की जो बाद में जाकर दारुल उलूम देवबंद बन गया,


मौलाना ने मिल्लत के नौनिहालों को दावत दी कि आइये हम आपको मुफ्त तालीम देंगे, मुफ्त कपड़े देंगे, मुफ्त खाना देंगे और रहने का इंतज़ाम भी मुफ्त करेंगे, मिशनरियों के कारिंदों ने मौलाना का मज़ाक उड़ाया कि तुम भूखे नंगे लोग इन बच्चों को क्या क्या मुफ्त में दोगे, तुम्हारे पास खुद के खाने के लिए पैसे नहीं इनको कैसे खिलाओगे..?

आंदोलन वक़्त के साथ बढ़ता गया और साल 1857 आ गया। लेकिन आंदोलन बढ़ता ही गया फिर अल्लामा फ़ज़ल-ए-हक़ ख़ैराबादी(गीतकार जावेद अख्तर के परदादा) ने दिल्ली की जामा मस्जिद से अंग्रेजों के ख़िलाफ़ फिर से जेहाद का फ़तवा दिया।


इस फ़तवे के बाद आपने बहादुर शाह ज़फर के साथ मिलकर अंग्रेजों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला और अज़ीम जंग-ए-आज़ादी लड़ी।

मौलाना ने कहा कि हम अपनी क़ौम के पास जायेंगे, उनसे चंदा लेंगे इमदाद ज़कात लेंगे लेकिन इन बच्चों को चने की दाल खिलाकर भी मुफ्त तालीम देंगे.. इन्शाल्लाह, इस तरह मौलाना क़ासिम नानौतवी रह0 ने नामुमकिन लगने वाले मिशन को मुमकिन कर दिखाया और क़ौम ने भी उलेमाए दीन का भरपूर साथ दिया.. माशाल्लाह

लेकिन बाद में इन्होंने अंग्रेजों से सन्धि कर ली तो सैय्यद अहमद ने मराठा सेना छोड़ तहरीके मुजाहिदीन आंदोलन शुरू कर दिया।


आंदोलन कई सालों तक चला आख़िरक 1831 में सय्यद अहमद रायबरेलवी और शाह इस्माइल की हार हुई और उन्हें शहीद कर दिया गया। 

तब तक इन्क़लाब आ चुका था, ईसाई मिशनरियां अपने बोर्डिंग स्कूल क़ायम कर चुकी थीं जिनमें उन्हीं मुजाहिदीन के बच्चों को दाखिले दिलाये जा रहे थे जिन्होंने अंग्रेजों से लड़ते हुए अपनी जाने कुरबान की थी, ईसाई मिशनरियां हमारे बच्चों को मुफ्त तालीम, कपड़े और खाना देकर उन्हें मुर्तद करती जा रही थीं, इन मिशनरियों को पूरी ईसाई दुनिया से फंड भेजे जा रहे थे।

30 हज़ार तो सिर्फ मोहद्दिस और उलेमा थे इनके साथ ना जाने कितने लाखों आम मुसलमानों को शहीद कर दिया गया।

1857 के जिहादे हुर्रियत के नाकाम होने के बाद का वक़्त हिन्द के मुसलमानों की तारीख का बदतरीन दौर था लाखों उलेमा व अवाम फांसी के फंदे पर लटकाये गए।  

जंग ए आज़ादी का वो दौर जब 30 हज़ार उलेमाओं को तोप से उड़ा कर शहीद कर दिया गया।


सिराजुद्दोला और टीपू सुल्तान की शहादत के बाद अँगरेज़ विरोधी आन्दोलन जनता में भड़कने लगा। 

जंग ए आज़ादी का वो दौर जब 30 हज़ार उलेमाओं को तोप से उड़ा दिया गया था

सय्यद अहमद रायबरेलवी ने ग्वालियर के राजा हिन्दू राव को लिखे गए अपने ख़त में अंग्रेज़ों के विरोध को खुलकर लिखा है और इस बात का इज़हार किया है की उनकी लड़ाई मुख्यतः अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंकने की लड़ाई है।

अकेले दिल्ली में 27 हज़ार मुसलमानों का क़त्ल ब्रिटिश (भारतीय) आर्मी ने किया था, शामली के मैदान के अज़ीम मुजाहिद मौलाना क़सिम नानौतवी रह0 अपने दीगर साथियों के साथ अंडर ग्राउंड हो चुके थे तकरीबन एक साल बाद ब्रिटिश सरकार के आम माफी के ऐलान के बाद मौलाना अपने साथियों समेत बाहर आये थे।