आप कहते हैं सरापा गुलमुहर है ज़िन्दगी,
हम ग़रीबों की नज़र में इक क़हर है ज़िन्दगी।  

भुखमरी की धूप में कुम्हला गई अस्मत की बेल,
मौत के लम्हात से भी तल्ख़तर है ज़िन्दगी।  

अदीबो ! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ,
मुलम्मे के सिवा क्या है फ़लक़ के चाँद-तारों में।  

रहे मुफ़लिस गुज़रते बे-यक़ीनी के तजरबे से,
बदल देंगे ये इन महलों की रंगीनी मज़ारों में।  

कहीं पर भुखमरी की धूप तीखी हो गई शायद,
जो है संगीन के साये की चर्चा इश्तहारों में।  

ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नज़ारों में,
मुसल्सल फ़न का दम घुटता है इन अदबी इदारों में।  

न इन में वो कशिश होगी , न बू होगी , न रआनाई,
खिलेंगे फूल बेशक लॉन की लम्बी कतारों में।  

ये वन्देमातरम का गीत गाते हैं सुबह उठकर,
मगर बाज़ार में चीज़ों का दुगुना दाम कर देंगे।  

सदन को घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखोगे,
अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे।  

अदम गोंडवी – आप कहते हैं सरापा गुलमुहर है ज़िन्दगी

जो डलहौजी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे,
कमीशन दो तो हिन्दुस्तान को नीलाम कर देंगे।  

सुरा व सुन्दरी के शौक में डूबे हुए रहबर,
दिल्ली को रंगीलेशाह का हम्माम कर देंगे।  

अदम गोंडवी – जो डलहौजी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे

अदम गोंडवी की कविताओं, ग़जलों और शायरियों का संग्रह

हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये,
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये।  

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है,
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये।   

डाल पर मज़हब की पैहम खिल रहे दंगों के फूल,
ख़्वाब के साये में फिर भी बेख़बर है ज़िन्दगी।  

रोशनी की लाश से अब तक जिना करते रहे,
ये वहम पाले हुए शम्सो-क़मर है ज़िन्दगी।  

दफ़्न होता है जहाँ आकर नई पीढ़ी का प्यार,
शहर की गलियों का वो गंदा असर है ज़िन्दगी।  

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले,
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये।  

हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ,
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये।  


छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़,
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये।