माना की मुहब्बत का छिपाना है मुहब्बत,
चुपके से किसी रोज़ जताने के लिए आ।  

जैसे तुझे आते हैं न आने के बहाने,
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ।  

अहमद फ़राज़– उर्दू शायरी- आपकी पसंदीदा शायरी एक जगह

कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत* का भरम रख,
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ।  

इक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिरिया से भी महरूम,
ऐ राहत-ए-जाँ मुझको रुलाने के लिए आ।


अब तक दिल-ए-ख़ुशफ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें,
ये आखिरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ। 
   

अहमद फ़राज़ – अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें

अहमद फ़राज़ – रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो,
नशा बड़ता है शरबें जो शराबों में मिलें।  

आज हम दार पे खेंचे गये जिन बातों पर,
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें।  


अब न वो मैं हूँ न तु है न वो माज़ी है “फ़राज़”,
जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें।  

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ,
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ।  

पहले से मरासिम न सही, फिर भी कभी तो,
रस्मों-रहे दुनिया ही निभाने के लिए आ।  


किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम,
तू मुझ से ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ।  

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें,
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें।  

ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती,
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें।  

तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा,
दोनों इंसाँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलें।