असगर पांच भाई और चार बहन हैं। असगर के परिवार में जमीन जायदाद के नाम पर गांव में बस दो कमरों का छोटा सा मकान और कुछ बकरियां हैं।

असगर की फीस अदा करने और गृहस्थी चलाने के लिए मां मैसरजहां ने कशीदाकारी शुरू कर दी। मां चिकेन की कशीदाकारी से कुछ रुपये इकट्ठा कर बेटे की फीस अदा कर देती थी।


जब एडमिशन या कोई बड़ा खर्चा आ जाता था तो घर में पली बकरियों में से एक को बेचकर फीस अदा करती थीं।    

जब हौसला बना लिया ऊंची उड़ान का फिर देखना फिजूल है कद आसमान का...यह लाइन लखीमपुर खीरी जिले के बेहद गरीब परिवार में जन्मे असगर अली पर सटीक बैठती है।


जिसने गरीबी को किनारे रख अपनी मेहनत लग्न से बुलंदियों को छू लिया है।

उत्तर प्रदश सिविल जज परीक्षा में असगर अली ने  सफलता हासिल की है। 27 वर्षीय असगर अली लखीमपुर जिले के मूसेपुर गांव के रहने वाले हैं।


असगर के घर की आर्थिक हालत अच्छी नहीं है। उनकी मां बकरे-बकरियों को बेचकर असगर की पढ़ाई की फीस भरती थीं।

असगर की कहानी ज़रूर पढ़ियेगा क्योंकि ये अनोखी है। ये सच है आज के दौर में कामयाबी पैसे के बिना नहीं मिलती शिक्षा एक व्यपार है और अकसर कामयाब होने वाले लोग अपने गाँव या शहर के संपन्न परिवार से ताल्लुक रखते हैं।  


असगर ने इन तमाम मुश्किलों को हरा कर एक ऐसी मिसाल कायम की है जो शायद बहुत लोगो के लिए हिम्मत का स्रोत बन सकती है।  

असगर अली ने एलएलबी व एलएलएम बीएचयू से किया। मौजूदा समय में बीएचयू से पीएचडी कर रहे हैं। असगर अली का बचपन से ही जज बनने का सपना था। 


असगर की इस सफलता के बाद मां मैसरजहां को मुबारकबाद देने वालों का तांता लगा हुआ है।

माँ तुझे सलाम- बकरियाँ बेच कर माँ ने पढ़ाया अब असगर अली बने जज