अब तो एक केंद्रीय मंत्री एसएस अहलुवालिया ने ही कह दिया है कि मौत का आंकड़ा हमारे पास नहीं है। उनका कहना है कि संख्या को लेकर सरकार ने कभी कोई दावा नहीं किया।


वायुसेना भी ऐसा ही कह रही है और विदेश मामलों की संसदीय समिति के सामने पेश हुए विदेश सचिव विजय गोखले ने भी ऐसा ही जवाब दिया।


हालांकि ये सच है कि 26 फरवरी को बालाकोट पर हमले के बाद की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेश सचिव ने कोई निश्चित संख्या तो नहीं बताई थी लेकिन एक लार्ज नंबर यानी हताहतों की बड़ी संख्या होने का जिक्र ज़रूर किया था।   

अगर युद्ध या युद्धोन्माद गया है, तो हम रोज़ी-रोटी के मुद्दे पर बात कर लें

तो क्या हमने सिर्फ चुनाव के लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाई है? ये सवाल अब गांव स्तर तक जा रहा है। बीजेपी के ही नेता बीएस येदियुरप्पा तो इन एयर स्ट्राइक और शहादतों से सीटों के नफा-नुकसान भी लगा चुके हैं। हालांकि इसके बाद उन्होंने अपने बयान पर सफाई भी दी।

सर्जिकल स्ट्राइक पार्ट-2 या बालाकोट में एयर स्ट्राइक में वाकई कोई आतंकी मारा गया भी है या नहीं, ये सवाल हम पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए छोड़ देते हैं, कि वे क्या पूछते हैं और क्या जवाब देते हैं।

Digital Uttar Pradesh

पिछले कुछ समय से युवा, छात्र, किसान, मज़दूर लगातार सड़क पर उतर रहे थे। बीते साल में किसानों के कई बड़े आंदोलन हुए और अभी 29-30 नवंबर, 2018 को देशभर के किसानों ने दिल्ली में धावा बोला।


इसी तरह औद्योगिक मज़दूरों ने 8-9 जनवरी, 2019 को दो दिन की बड़ी हड़ताल की। इसमें संगठित-असंगठित क्षेत्र के करीब 20 करोड़ मेहनतकश मज़दूर और कर्मचारी शामिल हुए।


इस सबके अलावा स्कीम वर्कर आशा, आंगनबाड़ी, मिड-डे मील वर्कर आदि लगातार आंदोलन कर रहे हैं।

अब जब चुनावी राजनीति तेज़ हो रही है और बाकायदा चुनाव घोषित होने वाले हैं तो क्या अब हमें यानी मीडिया को जनता के बुनियादी सवालों और सरोकारों पर नहीं लौट आना चाहिए।


हमारी जनता को भी क्या अब एक बार फिर पूरी मज़बूती से अपने रोज़ी-रोटी के सवालों को नहीं उठाना चाहिए।


छा ही जाना चाहिए कि कहां हैं हमारे हिस्से के अच्छे दिन? कहां है हमारा रोटी-रोज़गार? इसी में हमारा-आपका और हमारे देश का भला है।

ये सवाल आज भी हमारे लिए बना हुआ है कि पुलवामा हमले का ज़िम्मेदार कौन है, आख़िर किस की लापरवाही या कमी की वजह से हमनें अपने 40 जवानों को खो दिया, जबकि 48 घंटे पहले खुफिया इनपुट मिल चुका था कि इस तरह का कोई हमला हो सकता है।


हम पूछेंगे कि वो कौन था जिसने सीआरपीएफ के इतने बड़े काफिले जिसमें दो से ढाई हज़ार जवान और 70-72 गाड़ियां थीं किसने एक साथ मूव करने का आदेश दिया था।