इसके पीछे मनीषा की सोच है कि गरीबों को उनकी गरीबी का एहसास क्यों दिलाया जाए, उन्हें यह सोचने पर मजबूर क्यों किया जाए कि वे सिर्फ फटे-पुराने गंदे कपड़ों के हक़दार हैं। 

समाज के लिए कुछ करने का जज़्बा मनीषा में बचपन से था। उस दौर में भी उनसे जितना हो पाता, वे दूसरों के लिए किया करती थीं।

इस बारे में वह बताती हैं, “मैं काफी कपड़े लेकर वहाँ गई थी और अपने हाथों से बच्चों के बीच उन्हें बांटना चाहती थी, लेकिन संस्था के कर्मचारियों ने ऐसा नहीं करने दिया।


उन्होंने कहा कि आप यहीं रख दीजिए, हम बच्चों को दे देंगे। 

मनीषा कहती हैं, “मेरा शुरू से यह मानना रहा है कि हमें समाज में खुशियाँ बांटनी चाहिए, खासकर ऐसे लोगों के चेहरे पर मुस्कान बिखेरने का एक अलग ही सुख मिलता है, जिनके लिए खुशियाँ भी सोने जितनी महंगी हैं। मेरी कोशिश होती है कि जितना बन सके करूँ। 

उस संस्था को सरकारी अनुदान मिलता था, इसके बावजूद बच्चों की स्थिति अच्छी नहीं थी। तब मुझे लगा कि ऐसी संस्था को कुछ देने से अच्छा है सड़कों पर घूमने वाले उन लोगों की मदद की जाए, जिन्हें वास्तव में इसकी ज़रूरत है। 

 ये ‘सहारा’ भले ही आर्थिक न हो, लेकिन वक़्त के थपेड़े सहते-सहते थक चुके लोगों को पल भर के लिए कुछ खुशी ज़रूर दे जाता है। 

मैं पहले भी अकेले यह काम करती थी और आज भी अकेली हूँ। हाँ, इतना ज़रूर है कि अब लोग मेरे इस अभियान में सहयोग देने के लिए आगे आ रहे हैं।“

वैसे तो मनीषा कई सालों से गरीबों की मदद करती आ रहीं हैं, लेकिन असल मायने में उनके अभियान की शुरुआत कुछ वक़्त पहले तब हुई, जब वह कोटरा स्थित एक संस्था में पहुँचीं।

घर-घर से पुराने कपड़े इकट्ठा कर, धोकर-प्रेस करके ग़रीबों में बांटती है भोपाल की यह गृहिणी

मनीषा अपने पड़ोसियों, रिश्तेदारों और दोस्तों से पुराने कपड़े इकठ्ठा करती हैं और फिर उन्हें ज़रूरतमंदों में बांट देती हैं। यहाँ खास बात यह है कि वे गरीबों को कपड़े देने से पहले उन्हें धोना और प्रेस करना नहीं भूलतीं।

मनीषा गरीबों में केवल कपड़े ही नहीं बांटतीं, बल्कि झुग्गी बस्तियों में जाकर छोटे बच्चों से उनके जन्मदिन पर केक भी कटवाती हैं। इस वजह से बच्चे उन्हें ‘केक वाली दीदी’ कहकर पुकारते हैं।


भोपाल की मनीषा पिछले कई सालों से ऐसे लोगों का सहारा बनी हुईं हैं, जो विकास की दौड़ में काफी पीछे छूट गए हैं।