अब्दुल रहीम उर्फ चूना शाह बाबा टाटा स्टील में नौकरी करते थे। वो चूना खाते थे सो उनका नाम चूना शाह पड़ गया। 

ईद के महीने में होने वाला उर्स शुरू है। चूना शाह बाबा के दरबार में भारी भीड़ लगी है। लोग मन्नत मान रहे हैं। जिनकी मन्नत पूरी हो गई है वो मजार पर चादर चढ़ाते हैं।


कुछ लोग अन्न का दान करते हैं। 

चाईबासा से आए मुहम्मद निजाम ने बताया कि वो बीमारी से निजात पाने के लिए यहां आया है। मन्नत मान ली है। गम्हरिया की आलो दास बचपन से बराबर बाबा के दरबार में हाजिरी लगा रही है।

जमशेदपुर के बिष्टुपुर में चूना शाह बाबा की मजार हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है

बचपन में गभीर बीमारी से निजात मिली तो बाबा पर उसका भरोसा बढ़ गया। अनवरी बानो बिहार से आई हैं। उनका कहना है कि घर पर कई मुसीबतें आती हैं।


इसे दूर करने के लिए वो यहां आई हैं। जमशेदपुर के ही है रवि अपने लिए जॉब मांगने आए हैं। 

लंगर चल रहा है। चूना शाह बाबा के दरबार में कई लोग अपनी बीमारी से निजात पाने के लिए आए हैं। हर धर्म के लोग शामिल हैं।

मूल रूप से बिहार के समस्तीपुर के रहने वाले चूना शाह बाबा का इंतकाल 20 दिसंबर 1970 को हुआ था। चूना शाह बाबा का उर्स साल में दो बार होता है। एक अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार दिसंबर में और दूसरा इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक ईद के महीने में।

जमशेदपुर के बिष्टुपुर में चूना शाह बाबा की मजार हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है। इस दरबार में सभी धर्म के लोग आते हैं और मन्नतें मानते हैं।


मन्नत पूरी होने पर बाबा की मजार पर चादर चढ़ाते हैं।