अपने परिवार को चलाने के लिए मुझे काम करना पड़ा। मैंने जूनियर असिस्टेंट (LDC) के रूप में अनुकंपा के आधार पर नौकरी के लिए आवेदन किया और जिला कलेक्टर कार्यालय में अपने शैक्षिक प्रमाण पत्र प्रस्तुत किए। मुझे अपना ग्रेजुएशन छोड़ना पड़ा।

पिता की मृत्यु के बाद पढ़ाई छोड़ जॉब करने को हुए विवश, लेकिन एक संकल्प ने बना दिया IAS अफ़सर

एक साधारण परिवार में जन्में एलमबहावथ 12वीं कक्षा में पढ़ रहे थे, जब उनके पिता का देहावसान हो गया। पूरे परिवार के लिए आय का एकमात्र सहारा उनके पिता ही थे।


ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी एलमबहावथ के कंधों पर आ गई। परिस्थितियों के तले दबकर उन्होंने अपनी पढ़ाई को अलविदा कह दिया।

उनके पास कॉलेज की कोई औपचारिक शिक्षा भी नहीं थी। उन्होंने डिस्टेंस एजुकेशन से डिग्री पूरी की और सिविल सेवाओं सहित प्रतियोगी परीक्षाओं को लिखने का फैसला किया।


कई लोगों ने उनका मजाक उड़ाया यह कहकर कि जो व्यक्ति कॉलेज की पढ़ाई तक नहीं कर पाया, वह कैसे आईएएस बन सकता है। लेकिन उन्हें खुद पर विश्वास था।

साल 2016 में उनकी मेहनत रंग लाई और उन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए चुना गया। वर्तमान में वे तमिलनाडु केडर में कार्यरत हैं।


उनकी सफलता वाकई में बेहद प्रेरणादायक है। उन्होंने साबित कर दिखाया है कि यदि दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ सपनों का पीछा किया जाए, तो वह अवश्य प्राप्त होती है।

उन्होंने अपनी मेहनत को जारी रखा और राज्य की सार्वजनिक सेवाओं की परीक्षाएँ लिखीं। उन्हें समूह IV, समूह II, राज्य नागरिक सेवाओं के लिए चुना गया।


उन्हें राज्य सरकार में 6 बार नौकरी मिली। उन्होंने 7 वर्षों के लिए विभिन्न कार्य-एसआर एसटीएस से उप एसपी के रूप में काम किया। लेकिन इन नौकरियों में उनका मन नहीं लगा।

सरकारी तंत्र से परेशान होकर तमिलनाडु के के. एलमबहावथ ने प्रशासनिक ऑफिसर बनने का सपना देखा ताकि उन्हें जिन समस्याओं का सामना करना पड़ा था, वह किसी और को करना न पड़े। 


हुमंस ऑफ़ एलबीएसएनएए नामक एक फेसबुक पेज पर अपनी कहानी को साझा करते हुए उन्होंने लिखा कि आईएएस बनने के पीछे की मेरी एकमात्र वजह थी, वह यह कि प्रशासन और सरकार द्वारा लोगों से संबंधित समस्याओं को सुना जाए और इसके लिए मैं हमेशा तत्पर रहूँगा।

इस नौकरी को पाने के लिए उन्हें बहुत भाग-दौड़ करनी पड़ी। इस पोस्टिंग के लिए उन्होंने कुल 20 आवश्यक सर्टिफिकेट जुटाए। लेकिन, फिर भी उन्हें काम नहीं मिला।


ऐसा नहीं था कि वे इसका सामना करने वाले एकलौते इंसान थे। दूसरे लोग भी इस समस्या से जूझ रहे थे। अंत में उन्होंने सोचा कि, यदि इन समस्याओं को वरिष्ठ अधिकारियों के ध्यान में लाया जाए, तो वे शायद शिकायत का निवारण करेंगे।


इसी सोच के साथ उन्होंने कलेक्टर, कमिश्नर, मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री तक को पत्र लिखा लेकिन किसी ने उनकी सहायता नहीं की