शेर अली अफरीदी ने उस वक्त के गर्वनर जनरल लॉर्ड मेयो की हत्या कर दी थी, जो वाकई में पूरे अंग्रेजी राज के लिए बड़ा झटका था।


देश में उस वक्त अगर सबसे ज्यादा किसी की सिक्यॉरिटी थी तो वह गर्वनर जनरल की ही थी लेकिन 8 फरवरी 1872 में शेर अली ने तमाम सुरक्षा बंदोबस्तों को ध्वस्त करते हुए चाकू से गोद गोद कर लॉर्ड मेयो की हत्या कर दी थी।

शेर खान आफरीदीःजंगे आज़ादी का वो हीरो जिसने अंग्रेजी हुकूमत को पैरों तले रोंद दिया था

गर्वनर जनरल लॉर्ड मेयो ने अंडमान निकोबार के पोर्ट ब्लेयर में सेल्युलर जेल  के कैदियों के हालात जानने और सिक्यॉरिटी इंतजामों की समीक्षा करने के लिए वहां का दौरा करने का मन बनाया।

...शाम सात बजे का वक्त था, लॉर्ड मेयो अपनी बोट की तरफ वापस आ रहा था। लेडी मेयो उस वक्त बोट में ही उसका इंतजार कर रही थीं। वायसराय का कोर सिक्यॉरिटी दस्ता जिसमें 12 सिक्यॉरिटी ऑफिसर शामिल थे, वो भी साथ साथ चल रहे थे।


इधर शेर अली अफरीदी ने उस दिन तय कर लिया था कि आज अपना मिशन पूरा करना है, जिस काम के लिए वो सालों से इंतजार कर रहा था, वो मौका आज उसे मिल गया है और शायद सालों तक दोबारा नहीं मिलना है। वो खुद चूंकि इसी सिक्यॉरिटी दस्ते का सदस्य रह चुका था, इसलिए बेहतर जानता था कि वो कहां चूक करते हैं और कहां लापरवाह हो जाते हैं।


हथियार उसके पास था ही, उसके नाई वाले काम का खतरनाक औजार उस्तरा या चाकू। उसको मालूम था कि अगर वायसराय बच गया तो मिशन भी अधूरा रह जाएगा और उसका भी बुरा हाल होगा, वैसे भी उसे ये तो पता था कि यहां से बच निकलने का तो कोई रास्ता है ही नहीं।

उसने फैसले के खिलाफ अपील की, हायर कोर्ट के जज कर्नल पॉलाक ने उसकी सजा घटाकर आजीवन कारावास कर दी और उसे काला पानी यानी अंडमान निकोबार भेज दिया।


तीन से चार साल सजा काटने के दौरान उसकी तमाम क्रांतिकारियों से काला पानी की जेल में मुलाकात हुई, हालांकि उस वक्त तक क्रांतिकारी आंदोलन इतना भड़का नहीं था।


फिर भी अंग्रेज विरोधी भावनाएं मजबूत हुईं, जो भी लोग कैद थे उनमें से ज्यादातर अंग्रेजी राज के दुश्मन थे।


जेल में उसके अच्छे व्यवहार की वजह से 1871 में उसे पोर्ट ब्लेयर पर नाई का काम करने की इजाजत दे दी गई, एक तरह की ओपन जेल थी वो। लेकिन वहां से भागने की हिम्मत कोई नहीं कर सकता था।

एक खानदानी झगड़े में शेर अली पर अपने ही रिश्तेदार हैदर का कत्ल करने का इल्जाम लगा। उसने पेशावर में मौजूद अपने सभी अधिकारियों के सामने खुद को बेगुनाह बताया।


लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं मानी और उसे 2 अप्रैल 1867 को मौत की सजा सुना दी गई। उसका भरोसा अंग्रेजी अधिकारियों से, अंग्रेजी राज से एकदम उठ गया।


उसको लगा कि जिनके लिए उसने ना जाने कितने अनजानों और बेगुनाहों के कत्ल किए, आज वो ही उसे बेगुनाह मानने को तैयार नहीं थे। पहली बार उसे अहसास हुआ कि कभी भी किसी अंग्रेज पर कत्ल का मुकदमा चलने से पहले ही उसे ब्रिटेन वापस भेज दिया जाता था, लेकिन आज उसे बचाने वाला कोई नहीं क्योंकि वो अंग्रेज नहीं बल्कि भारतीय है।

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जंगे आज़ादी के बाग़ियों मे शामिल नाम शेर अली आफरीदी का भी है जिसने फांसी के फंदे पर झूलकर शहादत पायी लेकिन इतिहास के पन्नो मे इस महानायक पर कुछ नही लिखा गया।  


जिसने भारत को गुलाम बनाने वाली ब्रिटिश हुकूमत के राजप्रतिनिधि (वाइसराय) लार्ड मेयो की हत्या कर अंग्रेज़ी राज्य और ब्रिटेन मे बैठी महारानी तक को हिलाकर रख दिया था।

वायसराय जैसे ही बोट की तरफ बढ़ा, उसका सिक्यॉरिटी दस्ता थोड़ा बेफिक्र हो गया कि चलो पूरा दिन ठीकठाक गुजर गया। वैसे भी वायसराय तक पहुंचने की हिम्मत कौन कर सकता है, जैसे कि आज के पीएम की सिक्यॉरिटी भेदने की कौन सोचेगा! लेकिन उनकी यही बेफिक्री उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल हो गई। पोर्ट पर अंधेरा था, उस वक्त रोशनी के इंतजाम बहुत अच्छे नहीं होते थे।


फरवरी के महीने में वैसे भी जल्दी अंधेरा हो जाता है, बिजली की तरह एक साया छलावे की तरह वायसराय की तरफ झपटा, जब तक खुद वायसराय या सिक्यॉरिटी दस्ते के लोग कुछ समझते इतने खून में सराबोर हो चुका था लॉर्ड मेयो कि उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया।


शेर अली को मौके से ही पकड़ लिया गया, पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में दहशत फैल गई। लंदन तक बात पहुंची तो हर कोई स्तब्ध रह गया। जब वायसराय के साथ ये हो सकता है तो कोई भी अंग्रेज हिंदुस्तान में खुद को सुरक्षित नहीं मान सकता था।

उस समय अविभाजित भारत की तस्वीर बहुत अंखड थी और मीलों मील तक बसे भारत मे पेशावर का वो पख्तून ईलाका भी था जहा से शेर अली खान आफरीदी थे।


वैसे इस क्रांतिकारी के बारे मे कोई खास जानकारियां तो नही मिलती पर कुछ ब्रिटिश इतिहासकारों के साथ भारतीय लेखकों ने लार्ड मेयो की हत्या और अंडमान निकोबार पर लिखते हुए इस योद्धा का भी ज़िक्र किया है।