घंटों लोग चिल्लाते रहें, कभी रहीम पर तो कभी गामा पर सट्टा लगता रहा, भाव बढ़ते- घटते रहे। और अंत में नतीजा कुछ नहीं निकला। न कोई हारा और न ही कोई जीता, बराबरी पर यह खेल खत्म हुआ। पर इस मुक़ाबले के बाद गामा हिंदुस्तान भर में मशहूर हो गए।

अगले ढाई घंटे तक यह  मुकाबला चलता रहा, लेकिन कोई नतीजा न निकला और मैच ड्रा हो गया। पर एक विजेता तो चाहिए था, इसलिए एक हफ्ते बाद फिर से कुश्ती रखी गयी। 17 सितंबर 1910 को ज्बयिशको लड़ने ही नहीं आए और गामा को विजेता मान लिया गया।


पत्रकारों ने जब ज्बयिशको से पूछा तो उनका कहना था, ‘यह आदमी मेरे बूते का नहीं है।’ जब गामा से पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘मुझे लड़कर हारने में ज़्यादा ख़ुशी मिलती बजाय कि बिना लड़े जीतकर!’

इस तरह, गामा वर्ल्ड हैवीवेट चैंपियन बनने वाले भारत के पहले पहलवान बन गए। यह खिताब रुस्तम-ए-जहाँ के बराबर था।

19 साल का होते-होते गामा ने देश के कई नामचीन पहलवानों को पटखनी दे दी थी और फिर बारी आई ‘रुस्तम-ए-हिन्द’ रहीम बख़्श सुल्तानीवाला से लड़ने की।


पंजाब के गुजरांवाला के रहने वाले रहीम बख़्श सुल्तानीवाला की लम्बाई गामा से दो फीट ज़्यादा ही थी। और तब तक कोई भी रहीम का सानी नहीं था।

ग़ुलाम मोहम्मद बख़्श उर्फ़ गामा पहलवान, जी हाँ, वही गामा पहलवान, जिसने कुश्ती में न सिर्फ़ ‘रुस्तम-ए-हिन्द’ बल्कि ‘रुस्तम-ए-जहाँ’ का ख़िताब भी हासिल किया।

वही गामा पहलवान जिसके दम पर आज भी भारत को कुश्ती में विश्व विजेता कहलाने का मुक़ाम हासिल है।​​

लाहौर में दोनों के बीच कुश्ती का दंगल रखा गया। कहते हैं कि सारा लाहौर उस दिन सिर्फ यह दंगल देखने मैदान में टूट पड़ा था।


तकरीबन सात फुट ऊंचे रहीम के सामने पांच फुट सात इंच के गामा बिलकुल बच्चे लग रहे थे। सबने यही सोचा था कि थोड़ी देर में रहीम गामा को चित कर देंगे। 

सबसे पहले उनसे एक अमरीकी पहलवान मुकाबला करने आया। पर अमेरिकी चैंपियन बेंजामिन रोलर को उन्होंने सिर्फ 1 मिनट, 40 सेकंड में ही चित कर दिया।


फिर अगले दिन गामा ने दुनिया भर से आये 12 पहलवानों को मिनटों में हराकर तहलका मचा दिया। आयोजकों को हारकर गामा को दंगल में एंट्री देनी पड़ी।

गामा पहलवान का जन्म 22 मई 1878 को अमृतसर में हुआ था। उनके पिता, चाचा व ताऊ, सभी पहलवान थें। 

साल 1890 में जोधपुर के महाराज ने देशभर के पहलवानों के लिए एक प्रतियोगिता आयोजित की, जिसमें पहलवानों को अपनी कसरत, वर्जिश और कुश्ती की एक झलक दिखानी थी, ताकि राजा साहब ‘सबसे ताकतवर पहलवान’ चुन पाएं।

बस फिर क्या था, गामा का माथा फिर गया और उन्होंने एक-एक करके टूर्नामेंट में आये सभी पहलवानों को चुनौती दे डाली कि अगर कोई भी उन्हें हरा दे तो वे खुद अपनी जेब से जीतने वाले को 5 पौंड का इनाम देंगें और हिंदुस्तान लौट जायेंगें।

गामा पहलवान- कद कम बता कर जिसे किया बाहर, फिर जीता ‘रुस्तम-ए-जहाँ’ का ख़िताब

फिर आया सितम्बर 10, 1910 का वह दिन जब ‘जॉन बुल’‘ प्रतियोगिता में गामा के सामने विश्व विजेता पोलैंड के स्तानिस्लौस ज्बयिशको थे।


पर उन्हें भी गामा ने पहले ही राउंड में एक मिनट में पटखनी दे दी।

देश को फ़तेह कर यह पहलवान दुनिया को फ़तेह करने निकला और 1910 में लंदन में हो रही ‘चैंपियंस ऑफ़ चैंपियंस’ नाम की कुश्ती प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए पहुँच गया।


लेकिन यहाँ खेल के नियमानुसार गामा की लम्बाई कम होने के कारण उन्हें इस प्रतियोगिता में भाग नहीं लेने दिया गया। 

ये सब पहलवान गामा से उम्र और लम्बाई में काफ़ी बड़े थे, फिर भी गामा इस मुकाबले के अंतिम 15 पहलवानों में टिके रहे। एक 12 साल का लड़का 400 की भीड़ में आख़िरी 15 पहलवानों में अपना नाम बना गया,


इस बात ने राजा साहब को बहुत प्रभावित किया और उन्होंने गामा को इस प्रतियोगिता का विजेता चुन लिया। बस फिर क्या था, गामा के नाम के चर्चे पूरे देश में हो गये। इसके बाद कभी गामा ने पलटकर नहीं देखा।

वैसे तो दूसरे पहलवानों की तुलना में गामा का कद छोटा था, पर उनके हौसले और हर एक दांव-पेंच पर उनकी समझ बड़े-बड़े पहलवानों को चित्त कर देती थी।


मात्र 12 साल की उम्र में ही उन्होंने साबित कर दिया था कि यह पहलवान आगे चलकर यकीनन कुछ अलग करेगा।