टूटी-फूटी दीवारें, रही सही दीवारों से भी गिरता प्लास्टर, चिटकी हुई फर्श, मैदान में उगी ऊंची ऊंची घास, न पानी की व्यवस्था न टॉयलेट की…


कुछ ऐसी ही पहचान कुछ साल पहले तक थी प्रतापगढ़ जिले के कुंडा ब्लॉक के शहाबपुर गाँव के प्राथमिक विद्यालय की। ... और आज तस्वीर बिल्कुल बदल चुकी है।

बेहतर कामों की वजह से प्रधान प्रभाकर सिंह को कई बार सम्मानित भी किया गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रतापगढ़ की प्रभारी मंत्री स्वाती सिंह और जिलाधिकारी शंभूनाथ ने भी इन्हें सम्मानित किया है।

सरकारी बजट इतना नहीं मिलता है कि स्कूल का कायाकल्प हो पाता, ग्राम प्रधान ने अपने पास से और लोगों के सहयोग से विद्यालय पर अब तक करीब आठ लाख रुपए खर्च किए हैं। 


प्रभाकर बताते हैं, "आज स्कूल ऐसा बन गया है कि जिले के अधिकारी मुझे दूसरे स्कूलों में बुलाते हैं कि मैं दूसरे ग्राम प्रधान और अध्यापकों को बताऊं कि कैसे आप भी अपने स्कूल का कायाकल्प कर सकते हैं।"

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आज इस गांव में स्कूल है और अस्पताल है और उस से भी ज़्यादा गरीबो को उनका हक़ मिलता है।  

अगर ऐसी ही हर ग्राम प्रधान की सोच हो तो बदल जाएगी गाँवों की तस्वीर


प्रधान की कोशिशों से बदला प्रतापगढ़ जिले के कुंडा ब्लॉक के शहाबपुर गाँव का प्राथमिक विद्यालय, ग्राम प्रधान प्रभाकर सिंह को मुख्यमंत्री से लेकर जिलाधिकारी ने भी किया है सम्मानित 

भाकर बताते हैं, "2016 में उपचुनाव के बाद जब मैं ग्राम प्रधान बना तो सबसे पहले शिक्षा व्यवस्था सुधारने के बारे में सोचा और मीटिंग बुलाई। 

उसमें आंगनबाड़ी, आशा कार्यकत्री, सचिव, स्कूल के टीचरों से बात की। सबके साथ मिलकर कार्ययोजना बनाई। 

हमने स्कूल में सबसे पहले शौचालय का निर्माण करवाया। दरअसल बड़ी संख्या में छात्राएं सिर्फ टायलेट न होने की वजह से नहीं आती थीं। 

स्कूल में दरवाजे, खिड़कियां भी लगवाई। इतना बजट नहीं आता है कि हम मजदूर लगा पाते इसलिए मैंने खुद से श्रमदान शुरू किया। इसे देखकर गाँव के दूसरे लोग भी आगे आए हैं।"

अगर ऐसी ही हर ग्राम प्रधान की सोच हो तो बदल जाएगी गाँवों की तस्वीर

आज चमचमाती फर्श, दीवारों पर शानदार पेंटिंग, अत्याधुनिक लाइब्रेरी, कंप्यूटर लैब, साफ-सुथरे शौचालय और ढेर सारे बच्चे यहां बदलाव की कहानी कह रहे हैं। 

यह सब संभव हो सका है ग्राम प्रधान प्रभाकर सिंह की कोशिशों से। उन्होंने न सिर्फ बिल्डिंग संवारी बल्कि जरूरत पड़ने पर बच्चों को पढ़ाया भी। 

आज खूबसूरत टायल्स, पंखे, पार्क और साफ सुथरे शौचालय देख लोग यकीन नहीं कर पाते कि यह सरकारी प्राइमरी स्कूल है। 


इस बदलाव का ही असर है कि जहां 15 अगस्त 2016 में इस विद्यालय में 12 बच्चे थे, वहीं आज यह संख्या 250 है।