आज जिस सर्जिकल स्ट्राइक या छापामार जंग की चारो तरफ चर्चा है,उसकी ईजाद हज़रत खालिद बिन वलीद ने की थी।  

खालिद बिन वलीद इस्लाम लश्करके अज़ीम सिपहसालार रहे हैं। उस ज़माने की दो सुपर पावर  बाज़नतिनी एम्पायर ( क़ैसर हरक्युलिस ) और शहंशाहे फारस ( क़िसरा उर्दशेर ) की अज़ीम फौजों को जिन्होंने धूल चटाई और दोनों महान साम्राज्य के अल्लाह के फ़ज़ल से परखच्चे उड़ा दिये थे।  

एक बात गौर करने वाली है अरबो के सैनिको की संख्या दोनों साम्राज्य के सैनिको से जंग में कम होती थी लेकिन खालिद बिन वलीद ने अपने रणनीति के बल पर हर जंग में दुश्मन को शिकस्त दी।

आपकी वफ़ात सेना सेवा समाप्ति के चार वर्ष वाद 642 ईस्वी मे होम्स सीरिया में हुई थी।आपको होम्स में ही दफनाया गया था, उस स्थान पर आपके नाम से मस्जिद भी मौजूद है।  

बैजनटाइन और सस्सविद साम्राज्यों को कई जंगो में रौंदा…

खालिद बिन वलीद हर जंग में कामयाब हुए।उन्होंने एक तरफ शक्तिशाली बैजनटाइन साम्राज्य को यूरोप तक सीमित कर दिया वही इरान में मौजूद शक्ति शाली सस्सविद हुकुमत का तो अस्तित्व ही मिट गया।

इस्लाम से पहले की ज़िन्दगी-


हज़रत खालिद बिन वलीद जो रणनीति और कौशल के लिए विख्यात है का जन्म 592 ईस्वी में अरब के एक नामवर परिवार में हुआ था।


खालिद बिन वलीद ने जब इस्लाम मज़हब स्वीकार नही किया था तब तक इस्लाम के कट्टर शत्रु थे लेकीन 628 ईस्वी में आपने इस्लाम स्वीकार किया।

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इसी बहादुरी और शुजाअत को खिराजे तहसीन पेश करते हुए मुहम्मद साहब ने हज़रत खालिद बिन वलीद को “सैफुल्लाह” का खिताब अता फरमाया।

इस्लामी जंग एवम् लड़ाईयो पर चर्चा की जाये तो खालिद बिन वलीद का नाम प्रमुखता से लिया जाता


क्योंकि हर जंग में जांबाज़ी तथा पैंतरेबाज़ी एवम् होशियारी थी जिससे दुश्मन सेना के छक्के छुट जाते थे तथा दुनिया के एकमात्र ऐसे कमांडर है जिन्होने अपने जीवन में एक भी जंग या लड़ाई नही हारी।