उत्तर प्रदेश के मोहान (शहर उन्नाव) में जन्मे हसरत मोहानी का असली नाम सैय्यद फ़ज़ल उल हसन था।
तस्लीम लखनवी और नसीम दहलवी की शागिर्दी उन्हें अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ही में मिल गयी जहां उन्होंने शाइरी में महारत हासिल कर ली थी।
हिन्दुस्तान की आज़ादी के सबसे मशहूर नारों में से एक ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ का नारा मोहानी की ही देन है,ये नारा 1921 में उन्होंने दिया जिसे बाद में शहीद भगत सिंह ने मशहूर किया।
एक ऐसा शख़्स जिसने फ़क़ीरी और दरवेशी में अपनी ज़िंदगी गुज़ार दी, जिसका टूटा फूटा मकान था जिसमें टाट का पर्दा लगा रहता था।
जिसके पास एक मैला-कुचैला थैला रहा करता था। उस थैले में फटे पुराने कपड़े, एक लोटा और चंद कागज़ात रहा करते थे।
जो शख़्स जब संविधान सभा की बैठक में आता तो संसद के सामने एक टूटी सी मस्जिद में अपना क़याम करता। वो शख़्स जिसने कभी संसद से तनख़्वाह या कोई भी सरकारी सहूलियत नहीं लिया।
मुनव्वर राणा ने उसी शख़्स के बारे में मुहाज़िरनामा में लिखा है कि,
“वो पतली सी सड़क जो उन्नाव से मोहान जाती है
वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं।”
वो शख़्स जिसने कभी कांग्रेस को मज़बूत किया फिर ख़िलाफ़त आंदोलन ख़त्म किए जाने पर कांग्रेस से अपना रिश्ता तोड़ लिया।
वो शख़्स जिसने मुस्लिम लीग में रहकर उसके द्विराष्ट्रीय सिद्धांत का विरोध किया एवं पाकिस्तान बनने के विरोध में खड़े हो गए।
मौलाना हसरत मुहानी का जन्म 1 जनवरी 1875 को हुआ था, उर्दू के बड़े शायरो में शुमार किये जाने वाले हसरत को भारत की आज़ादी के आन्दोलन में महत्वपूर्ण योगदान के लिए भी याद किया जाता है।
भगत सिंह ने जिस “इंक़लाब ज़िन्दाबाद” नारे को मशहूर किया था उस नारे को जन्म देने वाले हसरत ही थे।
जंग-ए-आज़ादी के योद्धा मौलाना हसरत मोहानी-आज़ादी के वो हीरो जिन्हे भुला दिया गया