पत्रकार जैगम मुर्तजा की कलम से उनके निजी विचार…

कांग्रेस दक्षिण, मध्य और पश्चिमी भारत में नतीजों को लेकर अति आत्मविश्वास में है. उसने कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, केरल, आंध्र, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश और पंजाब के अलावा बंगाल, बिहार, असम के भरोसे अपनी खिचड़ी पकानी शुरु कर दी है. यूपी में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं है… न सीट, न वोट और न वोट बैंक जबकि पाने के लिए सबकुछ है…

ग़लती कांग्रेस की है चाहे बीएसपी की लेकिन ये तय हो गया है कि मायावती अब कांग्रेस का किसी हाल में समर्थन नहीं करेंगी…


अब दो ही गुंजाइश बचती है… या तो तीसरा मोर्चा बिना कांग्रेस सरकार बना ले या माया बीजेपी के साथ जाए…

हालांकि इमरान मसूद से मायावती की खुंदक सिर्फ रावण से रिश्तों को लेकर नहीं है. मेयर चुनाव में बीएसपी की हार और हाल मे कई स्थानीय नेताओं का कांग्रेस में शामिल होना वो पचा नहीं पा रहीं.


इधर एक इमरान की सीट के चक्कर में कांग्रेस ने बिजनौर, अमरोहा, आंवला, अलीगढ़ सीट पर बड़े दांव खेले हैं. मायावती अगर सहारनपुर में उम्मीदवार बदल दें तो शायद कांग्रेस अमरोहा, बिजनौर पर मान जाएगी. लेकिन अब ऐसा होगा नहीं. 

कांग्रेस ने 5 साल में पिछले दरवाज़े से आधा दर्जन दलित नेता पैदा कर दिए हैं. मायावती और कांग्रेस का मौजूदा विवाद भविष्य बचाने और बनाने की लड़ाई है.


इस लड़ाई में मुसलमान मूर्ख बन रहे हैं. मुसलमानो की चिंता वोटों के बंटवारे और बीजेपी की वापसी को लेकर है. हालांकि ये बीजेपी को रोकने की ठेकेदारी का टोकरा अपने सिर उठाने के लिए उनसे किसी ने नहीं कहा है.

लोकसभा चुनाव -क्या मायावती और कांग्रेस की लड़ाई में मुसलमान बेवक़ूफ़ बन रहे हैं?

विवाद की वजह चंद्रशेखर रावण, जिग्नेश मेवाणी, पीएल पूनिया जैसे दलित नेता हैं. मायावती का कहना है दलित वोटों पर उनका एकाधिकार है और वो इसमें किसी दूसरी पार्टी का दख़ल नहीं चाहतीं।  हालांकि बीजेपी के दलित नेताओँ पर वो कभी इस तरह मुखर नहीं हुई हैं।  

इधर मायावती के पास खोने के लिए बहुत कुछ है.. इस बार हारीं तो अगली बार टिकट के ख़रीदार दूर पूछने वाले भी नहीं मिलेंगे. मुक़ाबला दिलचस्प है. सरकार किसी की बने, मज़े लीजिए… चुनाव तो फिर पांच साल बाद आ जाएंगे… ये मज़ेदार समय फिर नहीं आएगा.