पलकों पे कच्ची नींदों का रस फैलता हो जब,
ऐसे में आँख धूप के रुख़ कैसे खोलिए।   

तेरी बरहना-पाई के दुख बाँटते हुए,
हम ने ख़ुद अपने पाँव में काँटे चुभो लिए। 

मैं तेरा नाम ले के तज़ब्ज़ुब में पड़ गई,
सब लोग अपने अपने अज़ीज़ों को रो लिए।

तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ साथ,
ऐसी बरसातें कि बादल भीगता है साथ साथ।  

बचपने का साथ है फिर एक से दोनों के दुख,
रात का और मेरा आँचल भीगता है साथ साथ।  

परवीन शाकिर– आपकी पसंदीदा शायरी एक जगह

वो एक रिश्ता-ए-बेनाम भी नहीं लेकिन,
मैं अब भी उस के इशारों पे सर झुकाऊँगी।  

बिछा दिया था गुलाबों के साथ अपना वजूद,
वो सो के उट्ठे तो ख़्वाबों की राख उठाऊँगी। 


समाअ'तों में घने जंगलों की साँसें हैं,
मैं अब कभी तिरी आवाज़ सुन न पाऊँगी।  

जवाज़ ढूँड रहा था नई मोहब्बत का,
वो कह रहा था कि मैं उस को भूल जाऊँगी।  

क्या क़यामत है कि जिन के नाम पर पसपा हुए,
उन ही लोगों को मुक़ाबिल में सफ़-आरा देखना।  

जब बनाम-ए-दिल गवाही सर की माँगी जाएगी,
ख़ून में डूबा हुआ परचम हमारा देखना। 
 

जीतने में भी जहाँ जी का ज़ियाँ पहले से है,
ऐसी बाज़ी हारने में क्या ख़सारा देखना।  

ख़ुश-बू कहीं न जाए प इसरार है बहुत,
और ये भी आरज़ू कि ज़रा ज़ुल्फ़ खोलिए।  

तस्वीर जब नई है नया कैनवस भी है,
फिर तश्तरी में रंग पुराने न घोलिए।  

बादबाँ खुलने से पहले का इशारा देखना,
मैं समुंदर देखती हूँ तुम किनारा देखना।  

यूँ बिछड़ना भी बहुत आसाँ न था उस से मगर,
जाते जाते उस का वो मुड़ कर दोबारा देखना।  


किस शबाहत को लिए आया है दरवाज़े पे चाँद,
ऐ शब-ए-हिज्राँ ज़रा अपना सितारा देखना। 
  

परवीन शाकिर– उर्दू शायरी- आपकी पसंदीदा शायरी एक जगह

डसने लगे हैं ख़्वाब मगर किस से बोलिए,
मैं जानती थी पाल रही हूँ संपोलिए। 

बस ये हुआ कि उस ने तकल्लुफ़ से बात की,
और हम ने रोते रोते दुपट्टे भिगो लिए। 

आइने की आँख ही कुछ कम न थी मेरे लिए,
जाने अब क्या क्या दिखाएगा तुम्हारा देखना।  

एक मुश्त-ए-ख़ाक और वो भी हवा की ज़द में है,
ज़िंदगी की बेबसी का इस्तिआ'रा देखना।  

कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी,
मैं अपने हाथ से उस की दुल्हन सजाऊँगी।  

सुपुर्द कर के उसे चाँदनी के हाथों में,
मैं अपने घर के अँधेरों को लौट आऊँगी। 
 

बदन के कर्ब को वो भी समझ न पाएगा,
मैं दिल में रोऊँगी आँखों में मुस्कुराऊँगी।  

परवीन शाकिर– आपकी पसंदीदा शायरी एक जगह

वो अजब दुनिया कि सब ख़ंजर-ब-कफ़ फिरते हैं और,
काँच के प्यालों में संदल भीगता है साथ साथ।  

बारिश-ए-संग-ए-मलामत में भी वो हमराह है,
मैं भी भीगूँ ख़ुद भी पागल भीगता है साथ साथ।   


लड़कियों के दुख अजब होते हैं सुख उस से अजीब,
हँस रही हैं और काजल भीगता है साथ साथ।  

बारिशें जाड़े की और तन्हा बहुत मेरा किसान,
जिस्म और इकलौता कम्बल भीगता है साथ साथ

परवीन शाकिर– आपकी पसंदीदा शायरी एक जगह

वो क्या गया कि रिफ़ाक़त के सारे लुत्फ़ गए,
मैं किस से रूठ सकूँगी किसे मनाऊँगी।  

अब उस का फ़न तो किसी और से हुआ मंसूब,
मैं किस की नज़्म अकेले में गुनगुनाऊँगी।