पीलीभीत अपने बांसुरी उद्योग के लिए जाना जाता है। आजादी के पहले से यहां बांसुरी का कारोबार चलता आ रहा है।


यहां की बनाई गई बांसुरी दुनिया के कोने-कोने तक जाती है। शहर के बीचो बीच स्‍थ‍ित लाल रोड की तंग गलियों से गुजरते हुए आपको कई ऐसे घर मिलेंगे जहां बांसुरी बनाने का काम हो रहा होगा।
पीलीभीत में बांसुरी बनाने वाले कई मुसलमान परिवार हैं, जो अपने पुश्तैनी काम को आगे बढ़ा रहे हैं।

पीलीभीत में बांसुरी बनाने वाले कई मुसलमान परिवार हैं, जो अपने पुश्तैनी काम को चला रहे हैं

रैबुनिशा बताती हैं, ''एक दिन में 300 से ज्‍यादा बांसुरी को रंग देती हैं। वो हंसते हुए कहती हैं, ''यह काम मुझे पंसद है और अब उन्‍हें इसकी आदत हो गई है, ऐसे में इसे करते हुए वक्‍त का पता ही नहीं चलता।''

हाफिज बताते हैं, ''मेरी उम्र 60 साल की है, मैं बचपन से ही इस काम में लगा हूं, मेरे दादा-परदादा यह काम करते आए हैं। फिलहाल मैं और मेरे परिवार के कई सदस्‍य इस काम से रोजी रोटी कमा रहे हैं।'' 

हाफिज कई साइज की बांसुरी बना लेते हैं। इसमें छोटी साइज से लेकर बड़ी साइज की बांसुरी शामिल है। बांसुरी 24 तरह ही होती हैं। इसमें नौ इंच से लेकर 36 इंच तक की बांसुरी आती है।

बांसुरी बनाने के काम में मुख्‍य रूप से मुस्‍लिम समुदाय के लोग ही शामिल हैं। इसमें बहुत से ऐसे हैं, जिन्‍हें यह हुनर उनके पुरखों से मिला है। जहां मर्द बांसुरी को काटने, छिलने और ट्यून करने का काम करते हैं, वहीं औरतें रंगाई और बांसुरी में सुराख करने का कम करती हैं। 

हाफिज नवाब की पत्‍नी रैबुनिशा बताती हैं, ''वो बचपन से बांसुरी को रंगने का काम करती आई हैं। शादी से पहले और बाद में भी यह काम कर रही हैं।'' 

फिलहाल पीलीभीत के बांसुरी उद्योग में लोग जरूर कम हुए हैं, लेकिन फिर भी व्‍यापार में ज्‍यादा फर्क नजर नहीं आता। हाफिज नवाब जैसे बुजुर्ग से लेकर राश‍िद मानवी जैसे नौजवान इस उद्योग से अपना खर्च चला रहे हैं और उनके मुताबिक वो इस धंधे से खुश भी हैं।

''ये कन्‍हैया जी की देन है जो हम लोगों की रोजी-रोटी चल रही है।'' यह बात बांसुरी बनाने वाले हाफ‍िज नवाब कहते हैं। हाफिज पीलीभीत के उन चंद कारिगरों में से एक हैं जो अपने पुश्तैनी बांसुरी बनाने के काम में लगे हैं।