राहत अली को उम्मीद है कि 31 जुलाई तक एनआरसी को अंतिम रूप दे दिया जाएगा जो असम के कई लोगों पर लगे बांग्लादेशी के टैग को खत्म कर देगा।


राहत अली ने कहा, ‘मेरा एनआरसी आवेदन रोक दिया गया था। मुझे उम्मीद है कि मेरे लिए, एक भारतीय से बांग्लादेशी और फिर भारतीय घोषित करने में देर हुई।’

राहत को वह तारीख भी याद नहीं है जब ब्रह्मपुत्र नदी के कटाव के कारण उनके पिता मुनीरुद्दीन, नलबारी जिले से चले आए थे।

राहत ने कहा उनकी पत्नी अब उन्हें बहुत मुश्किल से पहचान पाती हैं। उन्होंने कहा कि उनके बच्चों ने कभी यह नहीं बताया कि ट्रिब्यूनल में केस लड़ने के लिए सात लाख रुपये जमीन गिरवी रख कर जुटाए हैं। इसके लिए परिजनों ने 8 गायें और एक कॉमर्शियल गाड़ी बेच दी।

मामला असम के राहत अली का है। जो सात मई को गोलापाड़ा सेंट्रल जेल से तीन साल बाद छूटे हैं।


उन पर आरोप था कि वो ‘बांग्लादेशी’ हैं। राहत आली गोलापाड़ा सेंट्रल जेल के सुप्रीटेंडेंट से वादा कर के लौटे हैं कि वह वहां के बारे में कुछ ‘बुरा’ नहीं कहेंगे।

‘बांग्लादेशी’ बताकर डाला था जेल में, 3 साल बाद इंडियन साबित होने पर रिहा हुए ‘राहत अली’

अंग्रेजी अखबार The Hindu के अनुसार 60 साल पहले प्राइमरी स्कूल से पढ़ाई छोड़ने वाले राहत को ट्रिब्यूनल ने उम्र में अंतर के चलते उनकी नागरिकता पर शक किया था। 


राहत के वोटर आईडी कार्ड के अनुसार वह 55 साल के थे, हालांकि साल 2015 में ट्रिब्यूनल में दर्ज कराई  गई उम्र के अनुसार वह 66 साल के हैं। कई डॉक्यूमेंट्स में उनका नाम राहत अली लिखा हुआ था, तो कहीं रेहजा अली। 

एनआरसी को लेकर पहले ही विवाद जारी है। कथित तौर पर इस पूरी प्रक्रिया को अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के खिलाफ एक बड़ी साजिश के तौर पर देखा जा रहा है।