असम के करीमगंज जिले के अहमद अली को रिक्शा खींचते हुए एक दिन खुद के निरक्षर होने पर ग्लानि का अहसास हुआ। यह वाकया 1970 के दशक के आखिरी वर्षों का है। 


गरीबी के कारण बचपन में छोड़ना पड़ा था स्कूल, रिक्शा चलाकर खोल डाले 9 स्कूल

कुछ ही समय पहले इलाके के विधायक ने सरकारी योजना के अंतर्गत मेरे हाई स्कूल के विकास के लिए ग्यारह लाख रुपये की मदद की घोषणा की है।


मैं बूढ़ा हो रहा हूं, लेकिन आज भी रिक्शा खींचता हूं। मैं चाहता हूं कि अपनी आखिरी सांसों तक मैं अपने सपने को और विस्तृत करता रहूं।

विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

परिवार पालने के लिए मैं शुरू से ही रिक्शा चला रहा हूं। रिक्शा चलाने से हासिल होने वाली आमदनी से बमुश्किल भूख मिट पाती थी।


कमाई ऐसी नहीं थी, जिससे जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाने का अपना सपना साकार कर सकूं। लोगों से चंदा इकट्ठा करके भी कोई स्कूल नहीं खोला जा सकता था।


इन्हीं परिस्थितियों के मद्देनजर 1978 में मैंने अपनी जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा बेचने का निर्णय किया।

जमीन के बदले मिले पैसे और कुछ दूसरे इंतजामों की मदद से आखिरकार मैंने गांव में स्कूल खोल दिया। अपने गांव-मोहल्ले के बच्चों की शिक्षा के लिए यह स्कूल बहुत उपयोगी रहा।


लेकिन मैंने देखा कि आसपास के कई दूसरे इलाके हैं, जहां और स्कूलों की जरूरत है। फिर मैंने उन इलाकों में भी स्कूल स्थापित करने के लिए अपने प्रयास शुरू कर दिए। कुल दस स्कूल खोलने का लक्ष्य लेकर मैं आगे बढ़ता रहा।

शिक्षा की कमी के कारण अधिकांश परिवारों को विभिन्न तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।


गरीबी के कारण भले ही मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ी हो, लेकिन मुझे खुशी है कि मैंने अपने बच्चों समेत आसपास के सभी बच्चों के लिए इतना इंतजाम कर दिया है कि उनके साथ ऐसा न हो।

अहमद अली-अनपढ़ रिक्शाचालक ने बना डाले 9 स्कूल, पीएम मोदी ने भी की तारीफ

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अली अहमद असम के करीमगंज जिले के मधुरबोंद गांव में रहने वाला एक रिक्शा चालक हैं।


वो कहते हैं ''मैं पढ़ना चाहता था, लेकिन गरीबी के कारण बचपन में मुझे स्कूल छोड़ना पड़ा। पेट की भूख शांत करने के लिए किताबों की दुनिया से दूर होने पर मुझे बहुत पीड़ा हुई।


मगर इसी पीड़ा के एहसास के बाद मैंने तय कर लिया था कि मैं भविष्य में कुछ ऐसा करूंगा कि मेरे गांव का कोई भी बच्चा पैसे के अभाव में पढ़ाई से वंचित न रहे''।