आज़मगढ़ से 1998 और 2004 में अकबर अहमद डंपी बीएसपी के टिकट पर चुनाव जीते. इस सीट पर कभी भी कोई मुस्लिम सांसद नहीं रहा. 2009 में डंपी को 1,98,609 वोट मिले.


उन्हें बीजेपी के रमाकांत यादव ने 49 हज़ार से ज़्यादा वोटों से हराया. स्थानीय स्तर पर राजनीतिक पकड़ रखने वाली राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल के उम्मीदवार डॉ जावेद को 59,270 वोट मिले

मुसलमानों का आरोप है कि वो पार्टी को आंखें बंद करके वोट देते हैं लेकिन जब संगठन और मलाईदार पद देने की बारी आती है तो उनकी अनदेखी होती है. ऐसे में पार्टी को अपना जनाधार बनाए रखने के लिए ज़मीनी स्तर पर काम करने की चुनौती है.


अखिलेश यादव को समझना होगा कि सिर्फ बीएसपी से गठबंधन मुस्लिम वोट की गारंटी नहीं है.


इसके लिए भागीदारी भी एक शर्त है. वैसे भी सोशल मीडिया के इस दौर में जब हर व्यक्ति ख़ुद को राजनीतिक पंडित समझ रहा है ऐसे में वोट बैंक समेट कर रखना आसान नहीं है.


ये तब और भी कठिन है जब कांग्रेस और एमआईएम जैसी पार्टियां राजनीतिक विकल्प बनने का दम भर रही हैं

अभी भी पार्टी जहां मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट देती है वहां यादवों की अच्छी ख़ासी तादाद पार्टी उम्मीदवार के ख़िलाफ़ वोट करती है.


आज़मगढ़, संभल और बदायूं में डीपी यादव और रमाकांत यादव जैसे उम्मीदवारों को मिलने वाले वोट इसकी तस्दीक़ करते हैं. समाजवादी पार्टी अपने वोट बैंक को सामाजिक गठबंधन का दर्जा नहीं दे पाई है. 

 क्यों मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर समाजवादी पार्टी थोपती है मुलायम परिवार

सलीम इक़बाल शेरवानी 1984 में बदायूं से कांग्रेस के टिकट पर और फ़िर 1996, 1998, 1999 और 2004 में लगातार चार बार समाजवादी पार्टी के टिकट पर सांसद रहे.


2009 में सपा ने उनका टिकट काटकर मुलायम सिंह के भतीजे धर्मेंद्र यादव को दे दिया. शेरवानी फिर कांग्रेस में शामिल हो गए. लेकिन इसकी वजहें क्या थीं?

समाजवादी पार्टी पर मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर परिवार के उम्मीदवारों को तरजीह देने के आरोप लगते हैं। इन आरोपो में कितनी सच्चाई है इसके लिए कुछ सीटों पर नज़र डालते हैं। 


आज़मगढ़, बदायूं, संभल, फ़िरोज़ाबाद  जैसी सीटों को लेकर इस तरह का विवाद सबसे ज़्यादा है और  सोशल मीडिया पर इसे लेकर तमाम तरह के सवाल उठ रहे हैं।  

ये भी सच है कि समाजवादी पार्टी मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर अच्छा प्रदर्षन करती है.


तमाम मतभेदों के बावजूद यूपी में साइकिल मुसलमानों की लगातार पहली पसंद रही है. लेकिन समाजवादी पार्टी ने मुस्लिम यादव गठजोड़ को वोट बैंक की राजनीति से आगे नहीं जाने दिया

संभल का मामला थोड़ा अलग है. ये अकेली सीट है जहां नए परिसीमन के बाद मुस्लिम वोट बढ़ गए हैं. इस सीट से रामगोपाल यादव के दोबारा चुनाव लड़ने की चर्चा है.


2014 में हुए आम चुनाव में इस सीट पर बीजेपी के उम्मीदवार सत्यपाल सैनी को 3,60,000 वोट मिले.


उन्होंने समाजवादी पार्टी उम्मीदवार डॉ शफ़ीक़ुर्रहमान को क़रीब 5 हज़ार वोटों के अंतर से हराया. लेकिन इसी चुनाव में बीएसपी उम्मीदवार अक़ीलुर्रहमान ख़ान को 2,52,640 वोट मिले