सन 1884 में अरवल बिहार के एक ज़मीनदार ख़ानदान मे पैदा हुए शाह मोहम्मद ज़ुबैर किसी परिचय का मोहताज नही पर आज बड़े अफ़सोस के साथ ये कहा जा सकता है कि उनकी क़ुर्बानी क भुला दिया गया। 


एक ज़माना था जब इनकी एक आवाज़ पर हज़ारों की तादाद में अवाम जमा हो जाया करती थी।  

1912 में बाकीपुर पटना में हुए कांग्रेस के सालाना इजलास में चीफ़ आर्गानाईज़रों में से थे, इस इजलास में कांग्रेस के पिछले किसी भी इजलास के मुक़ाबले बड़ी तादाद में मुसलमान शरीक हुए थे और इसका सेहरा सच्चिदानन्द सिन्हा, मौलाना मज़हरुल हक़, हसन ईमाम वग़ैरा और शाह मोहम्मद ज़ुबैर के सर बंधता है।

फिर 1914 में मुंगेर की रहने वाली बी.बी सदीक़ा से शादी हो गई जिसके बाद शाह मोहम्मद ज़ुबैर मुंगेर चले गए और वहीं प्रैकटिस शुरु की और साथी ही सियासत में खुल कर हिस्सा लेने लगे, इसी दौरान मुंगेर ज़िला कांग्रेस कमिटी के सदर चुने गए और श्रीकृष्ण सिंह नाएब सदर और यहीं से शुरु होता है श्रीकृष्ण सिंह का सियासी सफ़र जो उन्हे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक ले जाता है।

श्रीकृष्ण सिंह भारत के बिहार राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री (1946–1961) थे। और उनके अनुसार उन्हे “श्रीकृष्ण सिंह” से “श्री बाबू” बनाने का योगदान सिर्फ़ एक आदमी को जाता है और वो हैं “शाह मोहम्मद ज़ुबैर” 

इसके बाद वो पटना में ही वकालत की प्रैकटिस करने लगे, वो अरवल में ही रहते थे और नाव के सहारे नहर के रास्ते अरवल से खगौल आते और फिर टमटम से पटना, ये उनका रोज़ का मामुल था।

जुलाई 1921 में प्रींस ऑफ़ वेल्स का मुकम्मल बाईकॉट किया गया, इसमे शाह मोहम्मद ज़ुबैर की क़यादत में मुंगेर भी आगे आगे था, इस वजह कर पहले इन्हे नज़रबंद किया गया फिर इन्हे, श्रीकृष्ण सिंह, शफ़ी दाऊदी, बिन्देशवरी और क़ाज़ी अहमद हुसैन को गिरफ़्तार कर भागलपुर जेल भेज दिया गया, गांधी ने इस गिरफ़्तारी की मज़म्मत की पर शाह मोहम्मद ज़ुबैर के साल क़ैद की सज़ा हुई।

बचपन से ही 1857 के बाग़ी, इंक़लाबी और क्रांतिकारीयों के कारनामों की कहानियां सुनते आ रहे शाह ज़ुबैर के अंदर एक नया जोश पैदा हुआ, इंगलैंड में रहते समय बार बार ये ख़्याल उनके दिल में आता के इतना सा छोटा मुल्क इतना ख़ुशहाल क्युं ?


मेरा मुल्क इतना बड़ा हो कर भी इतने से छोटे मुल्क का ग़ुलाम क्युं ? इतना ग़रीब और कंगाल क्युं ?

शाह मुहम्मद ज़ुबैर जिन्होंने  ‘सर’ का ख़िताब ठुकरा भारत की आज़ादी के लिए अपनी जान दी

शाह मोहम्मद ज़ुबैर की सेहत में बहुत ही गिरावट होने लगा, ये गिरावट 1923 में जेल से निकलने के बाद ही शुरु हो चुका था, पर मुल्क की आज़ादी की तड़प में ये मर्द ए मुजाहिद कहां चैन बैठने वाला था, इन्हे गोल मेज़ सम्मेलन में हिस्सा लेने इंगलैंड जाना पर उपर वाले को कुछ और ही मंज़ुर था, 12 सितम्बर 1930 को हिन्दुस्तान का ये बेटा मात्र 46 की उम्र में अपने मुल्क की आज़ादी का ख़्वाब अपने सीने में लिये इस दुनिया से रुख़सत हो गया, पुरे मुंगेर में रंज ओ ग़म का माहौल था, पुरी अवाम उनके घर पर मौजुद थी, अगर वहां कोई नही था तो वोह उनका छोटा भाई ‘शाह मोहम्मद उमैर’.. वोह उस समय हिन्दुस्तान की आज़ादी की ख़ातिर हज़ारीबाग़ जेल में क़ैद थे, और इस बात का ज़िक्र वो अपनी किताब “तलाश ए मंज़िल” में ख़ुद करते हैं।

इन्ही सब सवाल को दिल में लिए उन्होने बैरिस्ट्री की पढ़ाई मुकम्मल कर 1911 में पटना तशरीफ़ लाए, उसी समय टी.के.घोष स्कुल पटना और इंगलैंड से बैरिस्ट्री की पढ़ाई मुकम्मल कर लौटे लोगों ने बंगाल से बिहार को अलग करने की तहरीक छेड़ रखी थी, जिसमें कुछ नाम है, अली ईमाम, सच्चिदानन्द सिन्हा, मौलाना मज़हरुल हक़, हसन ईमाम वग़ैरा का, शाह मोहम्मद ज़ुबैर ने भी इस तहरीक को अपना समर्थन दिया।

शुरुआती तालामी घर पर हासिल करने के बाद शाह मोहम्मद ज़ुबैर को टी.के.घोष स्कुल पटना भेजा गया, जहां से उन्होने 1904 में उन्होने पढ़ाई मुकम्मल की, चुंके नेयोरा की ईमाम ख़ानदान इसी स्कुल का फ़ारिग़ था और आगे बैरिस्ट्री की पढ़ाई करने इंगलैंड गया था।


इस लिए शाह मोहम्मद ज़ुबैर के वालिद ने भी उन्हे 1908 में इंगलैंड भेज दिया, वहां उनकी दोस्ती उन हिन्दुस्तानीयों से हुई जो अपने मुल्क को आज़ाद करना चाहते थे।