सपा ने बरेली से आयशा इस्लाम, जबकि बसपा ने पीलीभीत से अनीस अहमद खां फूलबाबू को उतारा था।


इस बार सपा के साथ ही बसपा की सूची में भी मंडल से कोई मुस्लिम चेहरा नहीं है।

तब जबकि आंवला लोकसभा से चुनाव लडऩे की ख्वाहिश अपने वक्त के कद्दावर नेता एवं पूर्व सांसद अकबर अहमद डंपी भी जता चुके थे।

लोकसभा चुनाव 2019: सपा-बसपा ने रुहेलखंड की एक भी सीट पर मुस्लिम को नहीं दिया टिकट

जबकि सभी जगह टिकट मांगने वालों में मुस्लिम नेताओं की लंबी कतार थी। खैर, वोटों का ध्रुवीकरण रोकने की खास रणनीति के तहत छोड़ा गया तीर कितना सटीक रहेगा, यह तो चुनाव नतीजे आने के बाद ही साफ हो सकेगा।

सपा और बसपा के मंडल की पांचों सीटों के उम्मीदवारों पर नजर डालें तो एक भी चेहरा मुस्लिम नहीं है।


बरेली लोकसभा की ही बात करें तो यहां से पूर्व मंत्री अताउर्रहमान, पिछली बार की प्रत्याशी आयशा इस्लाम, उनके ससुर पूर्व विधायक इस्लाम साबिर, मुंबई के सेठ रईस अंसारी जैसे लोग टिकट की दौड़ में शामिल थे। 

बरेली : इसे भारतीय जनता पार्टी की तरफ से चुनाव में होने वाले हमलों का डर कहें या फिर पिछले लोकसभा चुनाव का सबक।


समाजवादी पार्टी और गठबंधन में उसकी सहयोगी बहुजन समाज पार्टी ने इस बार मंडल की पांच में से एक भी सीट पर किसी मुस्लिम चेहरे को नहीं उतारा है।

हालांकि इस मुद्दे पर दोनों दलों के प्रमुख पदाधिकारी खुलकर नहीं बोलना चाहते लेकिन अंदरखाने सपा-बसपा के गलियारों में चर्चा यही है कि इस बार के चुनाव में भाजपा को मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने से रोकने का प्रयास है।


पिछले चुनाव में खासकर सपा पर भाजपा की तरफ से मुस्लिम परस्ती के आरोप खुलकर लगे थे। मंडल में बदायूं से सपा मुखिया के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव ही जीत सके थे। बसपा पांचों सीट हार गई थी।  

पीलीभीत के पूर्व मंत्री हाजी रियाज अहमद का नाम भी सपा के गलियारों में बतौर दावेदार लिया जाने लगा था।


इस सबसे इतर सपा ने भगवत सरन गंगवार पर बाजी लगाने का फैसला लिया। ऐसा करने के पीछे गठबंधन की मजबूरी बताई जा रही है।


दरअसल, पिछले चुनाव में सपा और बसपा दोनों ने ही सूबे में सर्वाधिक मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिए थे।