किसानों को राहत देने व क्षेत्र में झुंड के झुंड घूम रहे इन पशुओं को ठिकाने लगाने के लिए सरकार के द्वारा ब्लॉक स्तर पर गौशाला निर्माण करने की भी हरी झंडी दी जा चुकी है।


लेकिन बसखारी विकास खंड क्षेत्र में कहीं भी गौशाला निर्माण की प्रक्रिया शुरू होती नहीं दिखाई पड़ रही है।

ये पशु किसानों का कितना नुकसान कर रहे हैं, गढचपा के मुकुंद तिवारी की बातों से समझा जा सकता है। वो पंचायत के प्रधान और बड़े किसान भी हैं। 

मुकुंद तिवारी बताते हैं, "अकेले हम लोग साल में 5-7 लाख का मक्का बेच लेते थे, लेकिन इस बार 10-15 कुंतल (1700 रुपए कुंतल) भी नहीं हुई है।

 यही हाल गन्ने का है। किसानों का फसल बचा पाना बहुत मुश्किल हो गया है। जल्द ही इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए तो किसान खेती नहीं कर पाएगा।"

एक तरफ क्षेत्र में झुंड के झुंड घूम रहे छुट्टा गोवंश किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचाते हुए दुर्घटना का सबब बनने के साथ स्वयं दुर्घटनाओं का शिकार होकर बीच सड़क पर तड़पते हुए दम तोड़ने पर विवश हैं। 

तो वहीं दूसरी तरफ किसानों व इन छुट्टा पशुओं को राहत देने के लिए सरकार के द्वारा उठाए गए गौशाला निर्माण के कदम को विभागीय अधिकारी आईना दिखा रहे हैं।

बता दें कि प्रदेश में भाजपा की सरकार बनते ही गोकशी पर रोक लगाए जाने से एकाएक इन छुट्टा पशुओं की क्षेत्र में बाढ़ सी आ गई है।


जो झुंड के झुंड हाईवे, गांव की सड़कों व किसानों के खेतों में पहुंच कर दुर्घटना का सबब बनने के साथ किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं।


ऐसा नहीं है सिर्फ किसान व यातायात करने वाले ही इन पशुओं की वजह से परेशानी का सामना कर रहे है।

उत्तर प्रदेश पशुपालन विभाग के अनुसार प्रदेश में करीब 11 लाख छुट्टा गोवंश हैं। 

लेकिन ग्रामीणों की मानें 59 हजार से ज्यादा ग्राम पंचायतों वाले इस प्रदेश में हर ग्राम पंचायत में 100 के करीब ऐसे जानवर होंगे। 

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ और हाथरस में इन छुट्टा पशुओं से परेशान किसानों ने इन जानवरों को हांककर सरकारी स्कूलों और अस्पतालों में बंद कर दिया। नाराज किसानों ने आंदोलन तक की धमकी दी है।

छुट्टा गोवंशों से संकट में खेती, अब यह किसानों की सबसे बड़ी समस्या बन गयी हैं 

सुरेंद्र बहादुर सिंह यहां पर श्री राधा गोशाला चलाते हैं। किसान और गायों की दुर्दशा पर वो कहते हैं, 

"सबसे बड़ी समस्या बछड़े हैं क्योंकि वो किसी काम के नहीं रहे। खेतों में उनका इस्तेमाल होता नहीं है और गाय इतना कम दूध देती हैं कि किसान उनका खर्च क्यों उठाए इसीलिए ये लोग ही उन्हें छुट्टा छोड़ देते हैं। 

अब वो फसलें चरती हैं, किसान भगाता है तो दूसरे खेत चलती जाती हैं। जहां तार लगे हैं वहां कटकर घायल हो रही हैं। किसान और गाय दोनों की दशा दयनीय है।" इस गाँव के पास कई ऐसी गाय और गोवंश हैं, जो तारों से कटकर घायल हुए हैं।