बंजारा एक ऐसा समाज है, जिसे हमारी सामाजिक व्यवस्था ने हमेशा दरबदर भटकने पर मजबूर किया है।


जाने कितने सालों से यह लोग अपना परिवार लेकर एक गाँव से दूसरे गाँव रोज़गार की तलाश में भटक रहे हैं।

ऐसा करने का आरोप इलाके के उन 101 में से 99 निजी अस्पतालों पर लगा है जिनके पास ऐसे ऑपरेशन करने की अनुमति है। बीड के सिविल सर्जन अशोक थोराट ने अपने बयान में कहा, ‘मामला प्रकाश में आने के बाद ज़िला अधिकारी ने एक कमिटी बनाई है।  

पिछले तीन सालों में 4000 से ज़्यादा महिलाओं के गर्भाशय निकालने के प्रकरण में महाराष्ट्र राज्य स्थित बीड ज़िला कुछ महीनों से चर्चा में है। 


ऐसा इसलिए किया गया ताकि वो बिना रुकावट काम करती रहें।  बीड एक ऐसा ज़िला है, जहां 40% आबादी मराठा और 60% बंजारा और अनुसूचित वर्ग के लोगों की है।

ज़्यादातर पीड़ित महिलाएं महाराष्ट्र के मराठवाड़ा के बीड़ और उसके आस-पास की हैं और इनकी उम्र 20 से 35 साल तक है।

कुछ दिन पहले इसी मामले से जुड़े एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में 20 पीड़ित महिलाएं मुंबई आई थीं और इनमें से सबसे युवा पीड़िता की उम्र 20 साल थी।

डॉक्टर की मिलीभगत से निकाले जा रहे महाराष्ट्र में गन्ना कटाई महिला मज़दूरो के गर्भाशय

इस कांड का ठीकरा उन ठेकेदारों पर फोड़ा जा रहा है जिनके लिए ये महिलाएं काम करती हैं।  इसमें निजी अस्पतालों की भी उतनी ही ग़लती बताई जा रही है।  


गर्भाश्य निकलवा रही महिलाओं के पास ऐसा कराने के पैसे तक नहीं होते। इसमें 40,000 तक का ख़र्च आता है और ऐसे में वो ये पैसे अपने ठेकेदारों से लेती हैं और बाद में चुकाती हैं।  

अभी की ताज़ा खबर के अनुसार बीड ज़िले के प्रशासन, महिला आयोग और स्वास्थ्य विभाग ने मिलकर गर्भाशय निकालने के लिए एक सूची तैयार की है।


उस सूची के अनुसार गर्भाशय की किसी गंभीर बीमारी के होते ही ऑपरेशन करने की इजाज़त स्वस्थ्य विभाग को दी जाएगी।  

कितनी आसान प्रक्रिया है ठेकेदारों और डॉक्टरों के लिए। एक को बंधुआ मजदूर मिल रहे हैं और दूसरे का धंधा भी चल रहा है।


मेडिकल की पढ़ाई में जितना खर्चा हुआ है, वह वसूलना भी तो है। गर्भाशय निकालने के बाद महिलाओं को और कितनी शारीरिक समस्याओं का सामना करना होगा, यह कोई नहीं बताता।