तस्मीदा भारत में रह रहे 40 हज़ार रोहिंग्या शरणार्थियों में पहली लड़की हैं जो कॉलेज जाएंगी। उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया में विदेशी छात्र कोटे के तहत फॉर्म भरा है।  

दिल्ली में बहने वाली यमुना नदी के किनारे बसे रोहिंग्या बस्ती में तस्मीदा टाट और प्लास्टिक से बने घर में माता, पिता और एक भाई के साथ रहती हैं। 

तस्मीदा पहली रोहिंग्या मुसलमान लड़की बनेंगी जो भारत में रहकर जाएंगी कॉलेज

बिगड़ते हालात को देखते हुए तस्मीदा के परिवार ने साल 2012 में भारत में शरण ली।  

अपने देश से निकलकर दो देशों में शरण लेना और अपनी कहानी बताते हुए तस्मीदा कहती हैं,


''हमारे दादा जी और पुरानी पीढ़ियों के पास नागरिगता थी लेकिन शिक्षित ना होने के कारण उन लोगों ने अपने अधिकार नहीं जाने और ये नहीं सोचा कि हमारी आने वाली पीढ़ी का क्या होगा। अब हम दर-दर की ठोकर खा रहे हैं. हम इस दुनिया के तो हैं लेकिन किसी देश के नहीं हैं। '

तस्मीदा ने बताया कि उनके लिए ऑनलाइन फ़ंड रेज़िंग की जा रही है और अब तक एक लाख 20 हज़ार रुपए ही जुट पाए हैं। मुझे, मेरे परिवार को उम्मीद है कि हमे लोगों की मदद मिलेगी।  

कॉलेज तक पहुंचने की लड़ाई तस्मीदा के लिए आसान नहीं रही। वो छह साल की उम्र में म्यांमार छोड़कर बांग्लादेश आ गईं लेकिन जब हालात बिगड़े तो भारी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश आने लगे। 

कॉलेज में जाने की ख़ुशी उनकी आवाज़ से साफ़ झलकती है, लेकिन जैसे ही वो अपने बीते हुए कल को याद करती हैं तो मानो सारी चमक उदासी में बदल जाती है।  

तसमीदा कहती हैं ''मुझे बचपन से डॉक्टर बनने का शौक था. मैं जब भारत आई तो 10वीं में एडमिशन के लिए आवेदन भरा लेकिन यहां मेरे पास आधार नहीं था। 

स्कूलों में एडमिशन नहीं मिला तो फिर मैंने ओपेन कैंपस से आर्ट्स का फॉर्म भरा। 10वीं पास करने के बाद मैंने 11वीं और 12वीं में राजनीति शास्त्र विषय चुना और जामिया के स्कूल में एडमिशन लिया।  

वो मज़ीद बताती हैं की हर दिन मैं बर्मा की ख़बरें देखती हूं वहां ना जाने कितने हमारे जैसे लोगों को मार देते हैं।  जला देते हैं, इसलिए मैनें सोचा कि मैं लॉ करूं और एक मानवाधिकार कार्यकर्ता बनूं।''

ये लड़की उन तमाम लोगों का चेहरा है जिनका कोई देश नहीं है। तस्मीदा उस रोहिंग्या समाज की नई पीढ़ी हैं जो दुनिया में सबसे ज़्यादा सताए गए समुदायों में से एक हैं।


एक रिफ्यूजी के आलावा उनकी कोई पहचान नहीं है और कोई देश नहीं है।  

अब फीस भरने के नहीं हैं पैसे
अब तस्मीदा के इरादे बुलंद हैं। उनकी आंखों में कुछ अलग करने की चमक साफ़ दिखती है। इस ख़ुशी को उनकी फ़ीस की चिंता फ़ीका कर देती है। 

वह कहती हैं, ''मैंने फॉरन स्टूडेंट कैटिगरी में आवेदन भरा है। इसकी सालाना फीस हम नहीं दे सकते. मुझे 3600 अमरीकी डॉलर सालाना देना होगा। हम कहां से इतने पैसे लाएंगे?''

अपने छह भाइयों की अकेली बहन तस्मीदा भारत में रोहिंग्या बच्चियों के लिए एक प्रेरणा बन गई हैं।