इस पर टीपू ने बेहद नाराजगी के साथ संस्कृत में जवाबी पत्र भेजा. इसमें उन्होंने लिखा, ‘लोग गलत काम करके भी मुस्कुरा रहे हैं। लेकिन उनकी इस गुस्ताखी ने हमें जो पीड़ा पहुंचाई है, उन्हें इसकी सजा भुगतनी होगी।’ 

लेकिन 1990 के दशक में कर्नाटक में हिन्दुत्व के उभार के बाद टीपू सुल्तान की छवि एक धर्मनिरपेक्ष शासक के बजाय मुस्लिम तानाशाह की बना दी गई। 


 हालांकि श्रृंगेरी मठ के ध्वंस और उद्धार की यह घटना इस छवि को अंगूठा दिखाती ही नजर आती है।  

यह घटना टीपू सुल्तान की उस छवि से बिल्कुल जुदा है जिसके मुताबिक वह एक कट्टर मुसलमान शासक था, साथ ही यह मराठों के हिंदू रक्षक होने की छवि भी तोड़ती है।  

यहां तक कि जिस शख्स को टीपू का दाहिना हाथ कहा जाता है, वह एक हिंदू था। वह थे उनके मुख्यमंत्री पूर्णैया। 


भारतीय उपमहाद्वीप के आधुनिक दौर में तो यह सोचना भी मुश्किल है कि पाकिस्तान की मौजूदा सरकार में कोई हिन्दू या हिन्दुस्तान की सरकार में कोई मुस्लिम दूसरा सबसे अहम और ताकतवर शख्स हो जाए।  

इसके साथ ही टीपू ने मठ के लिए माली मदद भी भेजी ताकि देवी की प्रतिमा वहां फिर स्थापित की जा सके।  नई प्रतिमा के लिए उन्होंने अपनी तरफ से अलग से चढ़ावा भी भेजा।  

इस हमले के वक्त मठ के स्वामी किसी तरह जान बचाकर भाग निकले थे।  बाद में उन्होंने टीपू सुल्तान को पत्र लिखकर उनसे मदद मांगी ताकि मठ और वहां के मंदिर में देवी की प्रतिमा को फिर स्थापित किया जा सके। 

भारतीय उपमहाद्वीप 1700 की शताब्दी के आखिरी सालों में मंझदार में फंसा दिख रहा था।  अब तक मुगल सिर्फ नाममात्र के शासक रह गए थे।  देश के अधिकांश हिस्सों में सत्ता का असल नियंत्रण उनके हाथ से निकल चुका था।   

इस दौर में 1789 में अंग्रेजों ने मराठों और हैदराबाद के निजाम को अपनी तरफ मिला लिया। ताकि अपनी राह के आखिरी कांटे को भी हटाया जा सके।


यह कांटा था, मैसूर का शासक टीपू सुल्तान, जिसने दूसरे कई शासकों की तुलना में काफी पहले ही ईस्ट इंडिया कंपनी से पैदा होने वाले खतरे और उससे मिलने वाली चुनौती को भांप लिया था।  

तारीख़-जब मराठों ने एक मंदिर तोड़ा और टीपू सुल्तान ने उसे फिर बनवाया

उस वक्त मराठा और टीपू सुल्तान एक-दूसरे को पसंद नहीं करते थे। यहां तक कि इस आपसी बैर की वजह से दोनों पक्षों के बीच लड़ाई वक्त से पहले ही शुरू हो गई थी। दरअसल, सबसे पहले टीपू के पिता हैदर अली ने भयंकर संघर्ष के बाद मराठाओं से देवनहल्ली (बेंगलुरू के पास) का किला छीन लिया था। 

 जवाब में 1791 में रघुनाथ राव पटवर्धन के नेतृत्व में मराठों ने मैसूर जिले के बेदनूर पर जवाबी हमला किया।  इसी हमले के दौरान उन्होंने श्रृंगेरी मठ को नुकसान पहुंचाया।