एक बार नेहरू ने मौलाना आज़ाद से एक मुस्लिम बहुल सीट से चुनाव लड़ने को कहा था,जिसपर मौलाना चेहरे के सुर्ख होने तक नाराज़ हुए ।

उनका कहना था कि अगर आज़ाद हिंदुस्तान में मुसलमान मुस्लिम बहुल क्षेत्र से ही जीतेगा तो यह लोकतंत्र का बदनुमा धब्बा होगा ।


कोई किसी भी धर्म का हो,किसी भी जाति का हो, किसी भी वर्ग का हो,वह वहाँ से जीतकर आए जहां उसके धर्म, जाति, वर्ग का वोट कम हो, यही तो खूबसूरती होगी लोकतंत्र की ।

किस सीट पर इतने हिन्दू इतने मुसलमान, कोई क्यों नहीं कहता कितने बेरोज़गार हैं?

आज भी आप मुस्लिम बहुल सीट से मुसलमान ही को टिकट देते हैं । आज भी मुसलमान चीखते हैं कि उनकी बहुलता में उन्हें ही टिकट दें । आज भी एक पार्टी जिस बात पर शर्म करनी चाहिए,उस बात पर गर्व करती है कि वह किसी मुसलमान को टिकट नही देने जा रही । आज भी आप पाँच साल अपने बीच रहने वाले प्रत्याशी की जगह पैराशूट से आते कथित सेलिब्रेटी पर लहालोट होते हैं ।

कोई यह नही जोड़ता की यहां इतने प्रतिशत किसान हैं और इतने प्रतिशत सरकारी कर्मचारी क्योंकि जिस दिन यह प्रतिशत निकलेंगे,

उस दिन उम्मीदवार से पहले अपने गिरहबान नज़र आएँगे।

आज भी जो नेता अपने धर्म जाति की बहुलता में नेतागिरी करते हैं, वह मेरी नज़र में लीडर हैं भी नहीं । आप लीडर हैं और वैचारिक मज़बूत हैं तो आप सेफ़ गेम खेलने वाले नही होंगे, जूझने वाले होंगे । वैसे तो सब भरभरा के गिर ही रहा है अभी और गिरेगा क्योंकि नफ़रत घर घर से दिल दिल मे उतर चली है । ज़ुल्म, ज़्यादती बुरी नही लगती ।


तड़पते लोग गुदगुदाते हैं । खून से लथपथ तस्वीरें मुस्कुराहट पैदा करती हैं ।गोलियों की आवाज़ के साथ चीखती जिंदगियां मद्धम मद्धम गीत सुनाई पड़ते हैं । यह सब क्यो,क्योंकि यह हमारे धर्म का खून नही है ।

जब मीडिया कहता है कि फला सीट पर इतने प्रतिशत मुसलमान है, इतने प्रतिशत हिन्दू है। जब तुम कहते हो फला सीट पर इतने प्रतिशत एससी हैं, इतने प्रतिशत ओबीसी हैं, इतने प्रतिशत जनरल हैं।
कोई यह नही कहता कि यहाँ इतने प्रतिशत युवा बेरोज़गार हैं, इतने प्रतिशत रोज़गार में हैं।