एक आँगन में दो आँगन हो जाते हैं,


मत पूछा कर किस कारन हो जाते हैं।  

हुस्न की दौलत मत बाँटा कर लोगों में,


ऐसे वैसे लोग महाजन हो जाते हैं।  


ख़ुशहाली में सब होते हैं ऊँची ज़ात,


भूखे-नंगे लोग हरिजन हो जाते हैं।  

राम की बस्ती में जब दंगा होता है,


हिंदू- मुस्लिम सब रावन हो जाते हैं। 
 

मुनव्वर राना – जिसे दुश्मन समझता हूँ वही अपना निकलता है

फ़ज़ा में घोल दीं हैं नफ़रतें अहले-सियासत ने,


मगर पानी कुएँ से आज तक मीठा निकलता है।  

जिसे भी जुर्मे-ग़द्दारी में तुम सब क़त्ल करते हो,


उसी की जेब से क्यों मुल्क का झंडा निकलता है।  


दुआएँ माँ की पहुँचाने को मीलों-मील आती हैं,


कि जब परदेस जाने के लिए बेटा निकलता है।  

उर्दू शायरी- आपकी पसंदीदा शायरी एक जगह

ज़रा-सा झुटपुटा होते ही छुप जाता है सूरज भी,


मगर इक चाँद है जो शब में भी तन्हा निकलता है।  

किसी के पास आते हैं तो दरिया सूख जाते हैं,


किसी की एड़ियों से रेत में चश्मा निकलता है। 

जिसे दुश्मन समझता हूँ वही अपना निकलता है,


हर एक पत्थर से मेरे सर का कुछ रिश्ता निकलता है।  

डरा -धमका के तुम हमसे वफ़ा करने को कहते हो,


कहीं तलवार से भी पाँव का काँटा निकलता है?